– बेचैनी व उलझन का है पर्सनालिटी कनेक्शन, न्यूरोप्लास्टिसिटी दिलाती है एंग्जायटी से मुक्ति

अयोध्या। कभी चिंतित या सशंकित होना सामान्य बात है पर निर्रथक चिंतित या शक-वहम के आगोश में रहना चिंतालु या शंकालु व्यक्तित्व-विकार के लक्षण होतें हैं जो आगे चलकर जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑडर, पैनिक एंग्जायटी डिसऑर्डर, क्लास्ट्रोफोबिया, अगोराफोबिया, ऑब्सेसिव-कंपल्सिव डिसऑर्डर तथा सिजोफ्रेनिया मनोरोग बन सकतें है।
तीव्र घबराहट यानि पैनिक-एंजायटी अटैक का मूल कारण तो मानसिक होता है,पर इसके लक्षण शरीर पर भी दिखाई पड़ते हैं जिनमे तेज़ धड़कन ,भारीपन, घुटन,पेटदर्द ,सर दर्द, ऐंठन,बेहोशी,शुन्नपन इत्यादि हो सकते हैं। शारीरिक जांच के सामान्य मिलने के बावजूद भी व्यक्ति के लक्षणों में राहत नहीं मिलती। रही सही कसर इंटरनेट पर लक्षणों की सर्च पूरी कर देती है।
चिंता-विकार से ग्रसित व्यक्ति सामान्य दर्द या तेज़ दिल की धड़कन आदि को किसी गंभीर बीमारी का लक्षण मान भयाक्रान्त होता रहता है जिसे इलनेस-एंग्जायटी डिसऑर्डर या रोग-चिंता विकार कहा जाता है। साठ फीसदी से अधिक लोगों में मौजूद चिंता-विकार ग्रसित लोगों में दो-तिहाई से अधिक किशोर व युवा वर्ग हैं।
स्वीकार्यता की कमी तथा मनोरोग के प्रति व्याप्त वर्जना व संकोच सटीक मनोचिकित्सा से वंचित या विलंवित करती है। सीबीटी तकनीक से नये स्वस्थ मेन्टल सॉफ्टवेयर का विकास किया जाता है जिसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहा जाता है। अनावश्यक चिन्ता , शक या डर बने रहने पर मनोपरामर्श लाभदायक होता है।
डा राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एन्ड टेक्नोलॉजी के सेंट्रल कम्प्यूटर लैब सभागार में आयोजित एंग्जायटी -डिसआर्डर जागरूकता कार्यशाला में डा आलोक मनदर्शन ने कही। निदेशक प्रो हिमांशु सिंह के निर्देशन व डा आशीष पाण्डेय के संयोजन में सम्पन्न सत्र में फैकल्टी व स्टूडेंट्स ने प्रतिभाग किया।