– ओपिआयड सब्सीट्यूशन थेरैपी है लत छोड़ने मे सहायक, नशा व असुरक्षित सेक्स ला रहा बहुआयामी रिस्क
अयोध्या। नशे की लत पारम्परिक रूप से शुरु होकर ओपिआयड- पदार्थो, नारकोटिक -टेबलेट, सिरप व इंजेक्शन तक जाती है। नशीले पदार्थ के सेवन से ब्रेन न्यूक्लियस में एडिक्टिव-हार्मोन डोपामिन की बाढ़ आ जाती है और मस्ती का एहसास होने लगता है फिर डोपामिन का स्तर सामान्य होने पर हिप्पोकैम्पस द्वारा डोपामिन की तलब पैदा होती है जिसे ड्रग-डिपेंडेंस कहा जाता है और ऐसे व्यक्ति को डोप-हेड या नशेड़ी कहा जाता है जिसकी नशे की मात्रा बढ़ती जाती है जिसे ड्रग-टोलेरेन्स कहा जाता है।
मनोविकार से ग्रसित या नशे की पारिवारिक पृष्ठभूमि या मित्रमण्डली से सरोकार में यह अधिक होता है। एक स्टडी के अनुसार, दो तिहाई ड्रग-यूजर्स की लत किशोरवस्था में ही शुरु होती है । नशीली सुइओ से नशा करने वाले ग्रुप में एक से ज्यादा लोगों द्वारा एक ही सिरिंज का इस्तेमाल व असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाने की मनोवृति एचआईवी व अन्य गंभीर यौन जनित संक्रमण के खतरे को बढ़ा रही है।
देश में 7.1 करोड़ से अधिक व्यक्ति मादक लत से ग्रसित हैं। एम्स दिल्ली के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर के अनुसार 57.4 लाख से अधिक महिलाएं व लड़कियां भी नशा-ग्रस्त हैं। पब कल्चर और रेव पार्टियां ड्रग-अड्डा बन गये हैं जिससे स्कूली लड़कियों भी अछूती नहीं हैं। छद्म आधुनिकता व चकाचौध, मनोतनाव तथा दोस्तों का दबाव उत्प्रेरक बन रहें हैं।
बचाव व उपचार:
जिला चिकित्सालय में संचालित ओपिआयड सब्सटीट्यूशन थेरेपी या ओएसटी केंद्र में नशीली सुइयों से नशा करने वालो को नशारोधी दवाओं व परामर्श से नशे से उबरने व सिरिंज जनित एचआईवी संक्रमण के खतरे से बचाव होता है जिसमें डेढ़ सौ से ज़्यादा लत-ग्रसित किशोर व युवा लाभान्वित हो चुके हैं। परिजन मैत्रीपूर्ण व सतर्क व्यवहार व निःसंकोच मनोपरामर्श बहुत कारगर है। जिला चिकित्सालय के मन कक्ष में विश्व नशारोधी दिवस-26 जून कार्यशाला में डा आलोक मनदर्शन ने यह बाते कही।