विश्वस्तरीय शोध कार्यों ने लोगों की समझ को किया परिष्कृत: प्रो. राम बूझ

” शोध प्रविधि” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का तीसरा दिन

अयोध्या। डाॅ0 राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के संत कबीर सभागार में इन्टरनल क्वालिटी एश्योरेन्स सेल के अन्तर्गत “शोध प्रविधि” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला के तीसरे दिन तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता प्रो0 राम बूझ, निदेशक मोबिस फाउंडेशन एवं पूर्व मुख्य वैज्ञानिक पर्यावरण एवं प्रकृतिक संरक्षण यूनेस्को, दिल्ली रहे।
तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए प्रो0 राम बूझ ने शोध में शैक्षिक गुणवत्ता की विश्व संदर्भ में चुनौती पर कहा कि शोध कार्य मानवीय संसाधनों की वृद्धि के लिए किये जाते है। विश्वस्तरीय शोध कार्यों ने लोगों की समझ को परिष्कृत किया है। यदि हम अपनी गुणवत्ता को और बढ़ाना चाहते है तो यह आवश्यक होगा कि उस क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ करने वाले लोगों से जुड़ा जाये। प्रो0 बूझ ने कहा कि शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह वास्तविक जीवन से दूर चला जाता है और उसकी रचनात्मकता खत्म होने लगती है। उन्होंने शैक्षिक संस्थानों की गुणवत्ता पर तकनीकी के बढ़ते प्रभाव पर कहा कि भारत के सौ से अधिक प्रसिद्ध एड्रायड एप्प में 44 चाइना के है। प्रो0 बूझ ने 2018 के सर्वेक्षण का विश्लेषण करते बताया कि चाइना विश्व का तीसरा गुणवत्तापरक शोध करने वाला देश है और उसके चार सौ बयासी वैज्ञानिकों के विश्वस्तरीय सहयोग है। उसकी अपेक्षा भारत का सहयोग मात्र दस प्रतिशत है। भारत से चार गुना ज्यादा शोध-पत्र चाइना में प्रकाशित होते है। इसी क्रम में पेटेंट के मामले में, स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अभी भारत काफी पीछे है।
तकनीकी सत्र को डाॅ0 हुमा मुस्तफा संयुक्त निदेशक यू0पी0 सीएसटी, लखनऊ ने शोध कार्यों में वैज्ञानिक अवधारणा पर विश्लेषण करते हुए बताया कि शोध कार्य एक ऐसी विधा है जिसमें सभी तथ्य एक साथ फिट होंगे तभी शोध कार्य सही दिशा में गतिशील होगा। डाॅ0 मुस्तफा ने बताया कि अच्छे शोध कार्य लिए सारांश एवं उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिये। शोध कार्य में आधुनिक डिजीटल तकनीकों का प्रयोग समय की बचत कर सकता है। प्रश्नावली में प्रश्नों का उद्देश्य स्पष्ट रूप से उल्लिखित होना चाहिए। शोध योजना का प्रारूप मानकों के अनुरूप हो एवं धन आवंटन से लेकर समय प्रबंधन पर स्पष्ट नीति होनी चाहिये। डाॅ0 मुस्तफा ने बताया कि शीर्षक न तो बहुत बड़ा हो और न ही बहुत छोटा। यह भी आवश्यक है कि प्रोजेक्ट क्यों महत्वपूर्ण है इसके अध्ययन का राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर क्या उपयोगिता है। सूचनाओं के संदर्भों को स्पष्ट रूप से जोड़े एवं साहित्यिक चोरी से बचे।
द्वितीय तकनीकी सत्र को बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के डाॅ0 सुभाष यादव ने डेटा कलेक्शन एवं सैम्पलिंग तकनीकी पर पी0पी0टी0 के माध्यम से शोध प्रविधियों में आवश्यक विन्दुओं से प्रतिभागियों को बताया। प्राथमिक डाटा एवं सेकेण्डरी डाटा के महत्व को भी क्रमवार प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि डाटा सत्यापन संग्रहण तकनीक एवं प्रश्नावली की तैयारी को लेकर एक वैज्ञानिक प्रस्तुति दी। आईक्यू0ए0सी0 के निदेशक एवं कार्यशाला के संयोजक प्रो0 अशोक शुक्ल ने बताया कि विश्व संदर्भ में शोध कार्यों के लिए भारत की भागीदारी को अभी वह स्तर नहीं मिल पाया है जिसके लिए हम सभी प्रयत्नशील है। विज्ञान, तकनीक, संस्कृति, प्रबंधन, जैव विविधता के क्षेत्र में भारत की भागीदारी विश्व को नया संदेश दे सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि शोध कार्यों में दृष्टिकोण विकसित करें जिससे विश्वस्तरीय मुकाम हासिल हो सके। कार्यशाला का संचालन प्रो0 नीलम पाठक ने किया। इस अवसर पर प्रो0 जसवंत सिंह, प्रो0 राजीव गौड़, डाॅ0 गीतिका श्रीवास्तव, डाॅ0 सुरेन्द्र मिश्र, डाॅ0 शैलेन्द्र कुमार, डाॅ0 नीलम यादव, डाॅ0 तुहिना वर्मा, डाॅ0 सिधू, डाॅ0 नीलम सिंह, डाॅ0 अशोक कुमार राय, डाॅ0 अजय कुमार सिंह, डाॅ0 अनिल यादव, डाॅ0 महेन्द्र सिंह, डाॅ0 विनोद चैधरी, डाॅ0 विजयेन्दु चतुर्वेदी, डाॅ0 आर0एन0 पाण्डेय, डाॅ0 योगेन्द्र त्रिपाठी, डाॅ0 अशोक मिश्र, डाॅ0 त्रिलोकी यादव, डाॅ0 अनुराग पाण्डेय, इं0 आर0के0 सिंह सहित बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे।

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