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सही समय पर टीबी का इलाज संभव : डॉ. बिजेन्द्र सिंह

-विश्व टीबी दिवस पर कुलपति ने टीबी मरीजों को पोषण पोटली देकर किया प्रोत्साहित

मिल्कीपुर। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय में विश्व टीबी दिवस (निक्षय दिवस) के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को जागरूक किया गया। परिसर चिकित्सालय द्वारा सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय के ऑडिटोरियम में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान कुलपति ने छह टीबी मरीजों को पोषण पोटली देकर उन्हें टीबी से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बिजेंद्र सिंह ने कहा की अगर मरीज सही समय पर अपना उपचार कराएं तो टीबी का इलाज संभव है।

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उन्होंने कहा कि टीबी से बचाव के लिए अपने इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत करना होगा। टीबी के मरीजों को साफ-सफाई पर ध्यान देना चाहिए साथ ही कम रोशनी वाली जगहों से बचना चाहिए। कुलपति ने टीबी के मरीजों से समय पर दवा खाने की अपील करते हुए उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की। सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की अधिष्ठाता डा. नमिता जोशी ने प्रस्तुतिकरण कर टीबी के लक्षण, सावधानी एवं उपचार के बारे में विस्तृत जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि अभी भी टीबी के सबसे अधिक मामले भारत में हैं और इसको जड़ से खत्म करने के लिए सभी को सामने आना होगा। उन्होंने बताया कि एचआईवी के मरीजों, शराब एवं तंबाकू का सेवन करने वाले लोगों को टीबी के संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। इससे पूर्व कुलपति ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का आयोजन चिकित्सालय परिसर की प्रभारी अधिकारी डा. नमिता जोशी की देखरेख में हुआ। कार्यक्रम का संचालन डा. जेबा जमाल एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रज्ञा पांडेय ने किया। इस मौके पर समस्त अधिष्ठाता, निदेशक, शिक्षक, वैज्ञानिक, कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएं मौके पर मौजूद रहे।

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जलवायु परिवर्तन खेती के लिए बड़ी चुनौती

-गुरुवार की देर शाम विश्व मौसम विज्ञान दिवस के अवसर पर “ बदलते जलवायुवीय परिदृश्य में फसलोत्पादन की चुनौतियां“ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. वेदप्रकाश ने कहा कि मौसम का पूर्वानुमान लगाना बहुत महत्वपूर्ण है। इससे कृषि जगत के अलावा तूफान, ओलावृष्टि, चक्रवात आदि से होने वाली क्षति को कम करने में मदद मिलती है।

मौसम वैज्ञानिक डा. सीताराम मिश्रा ने बताया कि गत वर्ष तापमान सामान्य से 6-7 डिग्री सेंटीग्रेड अधिक होने के कारण गेहूं का उत्पादन 20-25 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन खेती के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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