-मास-हिस्टीरिया व प्रोटेस्ट-एक्शन में है भिन्नता, बेबाकी व फूहड़ता के भेद को समझें युवा
अयोध्या। धरना, प्रदर्शन या आंदोलन जैसे सोशल एक्शन तब प्रकाश मे आते है जब किसी वर्ग विशेष के साथ जुर्म,अन्याय व शोषण आदि की घटना होती है ,क्योंकि इससे समानुभूति व साझा एकता महसूस होता है। ऐसी घटना विशेष से स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसाल व एड्रीनलिन मन मस्तिष्क मे बढ़कर व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर प्रोएक्शन व रिएक्शन की आम मनोदशा बनने लगती है, जिसकी अभिव्यक्ति समूह क्रिया व सोशल मीडिया में त्वरित दिखने के साथ ही जिम्मेदार तंत्र के प्रति आक्रोश स्वरूप आंदोलन व प्रदर्शन जैसे सोशल एक्शन होते है।
सोशल एक्शन पूरे विश्व में विभिन्न रूप मे समय समय पर दिखाई पड़ते रहते है। हमारा देश प्रोटेस्ट कैपिटल कहा जाता है जिसके पीछे जनसंख्या दबाव, सामाजिक,सांस्कृतिक व धार्मिक विविधता, अपर्याप्त नागरिक संसाधन व अन्य जिओ-पॉलिटिकल व क्रिमिनल जस्टिस के मुद्दे प्रमुख हैं। डेमोक्रेटिक-प्रोटेस्ट एक स्वस्थ मनोयुक्ति का कार्य करता है जिससे दमित गुस्से की अभिव्यक्ति से रिवार्ड- हार्मोन डोपामिन का संचार होता है। जंतर मंतर पर चल रहें नीट पेपर लीक स्टूडेंट-प्रोटेस्ट में जेन जी युवाओं व युवतियों की भाषाई-फूहड़ता, गाली-गलौच, अश्लीलता, मौज-मस्ती व अराजकता से युवा मनोविकृति की नई झलक भी समुचे देश को दिखी, क्योंकि युवाओं में बढ़ रहा नशा-जनित उन्मुक्त्तता-विकार पहले ही चिंता का विषय बन चुका है।
कुल मिलाकर यह स्टूडेंट-प्रोटेस्ट सामूहिक उन्माद या मास-हिस्टीरिया रूप में शुरु होकर सकारात्मक परिणाम से समाप्त हुआ,क्योंकि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े सहित सभी मांगे मान लिया जाना लोकतान्त्रिक नैतिकता को प्रतिबिंबित करता है। यह मनोविश्लेषण जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डा आलोक मनदर्शन ने किया।