-प्रेमचंद जयंती पर हुआ प्रलेस और जलेस का संयुक्त आयोजन

अयोध्या। प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ, फैजाबाद के संयुक्त तत्वावधान में ‘प्रेमचंद जयंती’ के अवसर पर ‘साहित्य, समाज और राजनीति : प्रेमचंद की वैचारिक विरासत’ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि-साहित्यकार स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचन्द हमारे लिए एक वैचारिक पुरखे की तरह हैं। उन्होंने सोच और विचार के स्तर पर जो प्रस्थान बिंदु हमें दिए वे आज भी एक पथ प्रदर्शक की तरह हैं। अपना वक्तव्य देते हुए आलोचक रघुवंशमणि ने कहा कि प्रेमचन्द ने साहित्य के प्रति लोगों के दृष्टिकोण को बदल दिया। उनकी विश्वदृष्टि का आज महत्व बढ़ गया है।
1980 के बाद भारतीय समाज और साहित्य में प्रेमचन्द की वापसी हुई जिसका कारण सत्ता में प्रतिगामी और सर्वसत्ता वादी ताक़तों का आना रहा है। प्रेमचन्द की प्रगतिशील दृष्टि हमारे लिए प्रकाशस्तंभ के समान है जो हमें भविष्य में दूर तक और देर तक रास्ता दिखाती रहेगी। कवि-चिंतक आर डी आनंद ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य हृदय परिवर्तन से शुरू होकर यथार्थ वाद की अभिव्यक्ति तक जाता है। उनके यथार्थवाद की वास्तविक चेतना गतिशीलता में है जो गोदान में धनिया के प्रतिरोध के रूप में फूटता है।
लेखिका विनीता कुशवाहा ने कहा कि प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम एक यथार्थ की यात्रा पर चले जाते हैं। समाज के दबे कुचले वर्ग के दारुण यथार्थ का सटीक चित्रांकन प्रेमचंद की रचनाओं में मिलता है। कवि-प्राध्यापक विशाल श्रीवास्तव ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि प्रेमचंद की वैचारिक विरासत इसीलिए समृद्ध है क्यूँकि वह अपने समय की हर विषमता को अत्यंत सजग दृष्टि से देखने के क़ायल थे। उनकी परख करने के लिए गहरी राजनैतिक समझ के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी लैस होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भारत के हर कोने सहित समूचे विश्व में प्रेमचंद की स्वीकार्यता उनकी परंपरा और जीवनमूल्य की परिचायक है
। जनमोर्चा की संपादक डॉ सुमन गुप्ता ने कहा कि हिंदी का सामान्य पाठक भी प्रेमचंद से अवश्य परिचित होता है। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जिस शोषण को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है, यह विसंगति है कि वह आज भी मौजूद है। आज भी समाज में अस्पृश्यता के उदाहरण दिखाई देते हैं। ऐसे में प्रेमचंद का बार-बार याद आना स्वाभाविक है। वरिष्ठ शायर रामजीत यादव बेदार ने कहा कि ईदगाह कहानी के माध्यम से प्रेमचंद तत्कालीन समाज में स्त्रीश्रम के प्रति संवेदना का एक पाठ प्रस्तुत करते हैं।
समाज के यथार्थ को सहज रूप में समझाने का काम एक ही लेखक कर सकता था, वह थे मुंशी प्रेमचंद। मो ज़फ़र ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने उर्दू लेखन में भी समाजी मसाइल को केंद्र में रखा। उन्होंने कहा कि आज प्रेमचंद के बारे में बात करने के लिए इतने लोग इकट्ठा हैं, यह बहुत मानीखेज़ है। डॉ राजकिशोर ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियों में वर्णित पीड़ा का तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। युवा कवयित्री पूजा श्रीवास्तव ने कहा कि एक युवा के रूप में मुझे प्रेमचन्द आश्वस्त करते हैं कि आज की नई पीढ़ी को किस प्रकार के लेखकीय आदर्श की आवश्यकता है। युवा पत्रकार नाज़िश फ़ातिमा ने कहा कि आज के समय में प्रेमचंद से अधिक प्रासंगिक कोई दूसरा लेखक नहीं है। वे हर युग में समकालीन नज़र आते हैं। प्रेमचंद का लेखन अत्यंत व्यापक है और वे समाज के हर पहलू को स्पर्श करते हैं।
युवा लेखक विंध्यमणि ने कहा कि आज प्रेमचंद जैसे किसी लेखक का होना असंभव है, उनके जैसी व्यापक दृष्टि का लेखक अब कहीं दीखता नहीं। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन देते हुए सत्यभान सिंह जनवादी ने कहा कि प्रेमचंद समूचे विश्व में सदैव प्रासंगिक रहेंगे। कार्यक्रम में अशोक कुमार तिवारी, राजीव श्रीवास्तव, अखिलेश सिंह, मुज़म्मिल फ़िदा, रामदास सरल, अयोध्या प्रसाद तिवारी, प्रेरणा, डॉ रणजीत वर्मा, विनय करुण, मांडवी सिंह, चन्द्रभान, उमाकांत विश्वकर्मा, जय प्रकाश श्रीवास्तव, प्रशांत आनंद, शिवांगी नंद, कुमकुम भाग्य,शैलेन्द्र सिंह,महावीर पाल सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, संस्कृति कर्मी और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग मौजूद रहे।