-इंटरनेट मीडिया जनित क्षद्म रोग-चिंता है साइबरकांड्रियासिस, जागरूकता व मनोउपचार दिलाता है निजात
अयोध्या। हाइपोकॉन्ड्रियासिस या इलनेस-एंग्जायटी डिसऑर्डसर-आईएडी एक चिंता-विकार है जिसमे किसी गंभीर, निदान न हुई बीमारी होने का तीव्र और निरंतर भय बना रहता है । इससे ग्रसित व्यक्ति शरीर के सामान्य संकेतों को गंभीर बीमारी के लक्षण समझकर अनावश्यक चिकित्सा परीक्षण व परामर्श करते है तथा फिजीशियन द्वारा दिए गए आश्वासन से असंतुष्ट हो क्षद्म-बीमारी के भ्रम व भय में फंसे रहकर नित नये परामर्श व जांचे कराते हैं जिसे डाक्टर-शॉपिंग कहा जाता है।
क्षद्म शारीरिक लक्षणों को ही वास्तविक मानते हुए मनोपरामर्श के लिए उदासीनता या नकारात्मकता से समस्या बढ़ती जाती है,क्योंकि मनोरसायनिक असन्तुलन ही समस्या की जड़ होती है। शरीर की सामान्य क्रियाओं जैसे दिल की तेज़ धड़कन, थकान, गैस, डकार, हिचकी, एसिडिटी, सरदर्द या अन्य मांसपेशीय खिचाव आदि से घबराकर ब्लड प्रेशर, पल्स रेट आदि तुरंत चेक करवाते हैं जो उस समय स्वभाविकतः असामान्य मिलता है।
किसी अन्य की बीमारी सुनते ही भयाक्रांत हो खुद की मेडिकल जांच पड़ताल में जुट जाना व इंटरनेट पर विभिन्न रोगों से संबंधित कंटेंट को सर्चकर उन लक्षणों की क्षद्म-अनुभूति में फंस कर क्षद्म-उपचार से आशक्त होना भी इसी का रूप है जिसे साइबरकांड्रियासिस कहा जाता है। अतीत के मनोआघात, चिंतालु व्यक्तिव विकार, अति नियमवादी व्यक्तित्व विकार व जेनेटिक्स इसके कारक पहलू होते हैं।
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (सीबीटी) से डरावने विचारों को बदलने व चिंता-व्यवहार कम करने में मदद मिलती है तथा मूड स्टेबलाइज़र व चिंतारोधी दवाओं से ब्रेन केमिस्ट्री संतुलित होती है। सैन्य चिकित्सालय में आयोजित मनोरोग जागरूकता कार्यशाला में यह बातें जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डा. आलोक मनदर्शन ने कही। कैप्टन प्रवेश शर्मा द्वारा संयोजित सत्र में सैन्यकर्मी व परिवार मौजूद रहे।