-प्रतिरोधी जीनोटाइप टी-59 की पहचानय किसानों को मिलेगी राहत

मिल्कीपुर। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज के वैज्ञानिकों ने सरसों की फसल को भारी नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी अल्टरनेरिया ब्लाइट पर महत्वपूर्ण शोध कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह शोध भविष्य में सरसों की प्रतिरोधी किस्मों के विकास में मील का पत्थर साबित होगा। विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के एमएससी छात्र अनुराग मिश्रा ने प्रोफेसर डॉ. नवाज अहमद खान के मार्गदर्शन में यह शोध पूरा किया। इस कार्य में आशुतोष सिंह का भी योगदान रहा। अनुराग मिश्रा वर्तमान में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, समस्तीपुर बिहार में शोधरत हैं।
शोध के दौरान भारतीय सरसों यानी ब्रासिका जुनसिया के 282 जीनोटाइप का दो मौसमों में परीक्षण किया गया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य ऐसे जीनोटाइप की पहचान करना था जो अल्टरनेरिया ब्लाइट के प्रति प्रतिरोधी हों। परीक्षण के बाद 10 बेहतर जीनोटाइप चुने गए। इनमें टी-59 को मध्यम प्रतिरोधी और एनडीआरई-7 को संवेदनशील पाया गया। यह बीमारी अल्टरनेरिया ब्रासिकिकोला नामक फफूंद से होती है। यह पत्तियों, तनों और फलियों को संक्रमित कर उपज में 50 प्रतिशत से अधिक तक नुकसान पहुंचा सकती है।
शोध में सामने आया कि प्रतिरोधी जीनोटाइप टी-59 में एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम की गतिविधि अधिक होती है। ये एंजाइम पौधे को संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं। साथ ही टी-59 में सैलिसिलिक एसिड, जैस्मोनिक एसिड और एथिलीन जैसे रक्षा हार्मोन से जुड़े जीन अधिक सक्रिय पाए गए। फैटी एसिड प्रोफाइलिंग से पता चला कि तनाव की स्थिति में टी-59 में असंतृप्त वसा अम्ल बढ़ जाता है। यह कोशिका झिल्ली को मजबूत बनाकर रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आर्द्रता और तापमान में उतार-चढ़ाव से यह रोग तेजी से फैल रहा है।
पारंपरिक रासायनिक फफूंदनाशक महंगे हैं और पर्यावरण के लिए जोखिम भरे हैं। प्रो. डॉ. नवाज अहमद खान ने बताया कि यह शोध प्रतिरोधी किस्मों के विकास की दिशा में अहम कदम है। इससे किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता की फसल मिल सकेगी। यह देश की तिलहन उत्पादन क्षमता को मजबूत करेगा।