-जंग व आपदा बनती है सामूहिक-मनोआघात, मन के घाव का होता है मनोशारीरिक दुष्प्रभाव
अयोध्या। सदमा, मनोआघात,मनोघाव, मेन्टल-शाक या नर्वस-ब्रेकडाउन नामक मेन्टल-ट्रामा की मनोदशा से भय,हताशा,कुंठा, ग्लानि, दुःख, प्रतिशोध व आत्मघाती मनोप्रतिक्रिया की सम्भावना होती है जिसे पोस्ट-ट्रामैटिक स्ट्रेस- डिसऑर्डर या पीटीएसडी कहा जाता है। एक्यूट-ट्रामा या आकस्मिक आघात किसी दुर्घटना,हमला या प्राकृतिक आपदा से उत्पन्न होता है, वहीं कलेक्टिव-ट्रामा या सामूहिक-आघात के लिये युद्ध, धार्मिक व नस्लवाद आधारित संघर्ष जिम्मेदार होते हैं।
करीबी संबंधों मे कटुता, धोखा या घरेलू हिंसा आदि रिलशनल- ट्रामा या संबंधाघात को जन्म देते हैं। बार-बार व लम्बे समय तक होने वाले तनाव रिपीटेटिव-ट्रामा या बारम्बारता-आघात की श्रेणी में आते है जैसे सतत उत्पीड़न या दीर्घकालिक बीमारी। मनोआघाती व नकारात्मक खबरें,रील व वीडियो के लगातार एक्सपोजर से परोक्ष मनोआघात या विकैरियस-ट्रामा की संभावना बनती है। असुरक्षित,अस्थिर व भावनात्मक उपेक्षा व हिंसा के माहौल में पले बड़े होने से डेवलपमेंटल ट्रामा या विकासात्मक आघात हो सकता है ।
दुष्प्रभाव व सलाह-
मनोआघात-प्रतिक्रिया दो प्रकार की होती हैं जिसमे प्रथम है हाइपर-अराउजल या अति-उत्तेजक तथा दूसरा है हाइपो-अराउजल या मंद-उत्तेजक। अति उत्तेजक प्रतिक्रिया में आघात से लड़ने या संघर्ष की स्थिति फाइट-मोड तथा पलायन करने की दशा फ्लाइट-मोड कहलाती है। हाइपो-अराउजल या मंद-उत्तेजना प्रतिक्रिया में आघात से स्तब्ध या फ्रीज होना,आत्म-समर्पण या फ्लॉप तथा आघाती शक्ति की चापलूसी करना या फान की मनोस्थिति होती है।
मनोआघात के दुष्प्रभावों में पैनिक-एंग्जायटी, अनिद्रा, दुःख-स्वप्न,भय, ग्लानि, घबराहट, नशा खोरी, मेमोरी फ्लैश-बैक, चीखना, रोना, आत्मघाती या परघाती विचार जैसे गंभीर लक्षण दिखायी पड़ते हैं। सम्यक मनोउपचार व पुनर्वास से आघात-विकार का प्रबंधन सम्भव है। राजा मोहन मनूचा गर्ल्स पी जी कॉलेज में आयोजित मनोआघात जागरूकता माह समापन कार्यशाला में यह बातें डा आलोक मनदर्शन ने कही।अध्यक्षता प्राचार्य प्रो मंजूषा मिश्रा तथा संयोजन प्रो सुषमा पाठक व संचालन डा ज्योतिमा सिंह ने किया।