बिना नसबंदी किये टांका लगाकर कर दिया वापस

महिला के देवर ने डॉक्टर पर सुविधा शुल्क मांगने का लगाया आरोप

बीकापुर। डॉक्टर (चिकित्सक) को मरीज का दूसरा भगवान कहा जाता है। परन्तु उपचार के दौरान जब वह मर्यादा को तार-तार कर अपने दायित्व से मुकर जाय तो उसे क्या कहा जायेगा इसकी समझ सिर्फ तीमारदार या दुख मरीज को ही हो सकेगी। इसकी ताजी मिशाल बीकापुर सीएचसी में नसबंदी आपरेशन के लिये लायी गई बैंतीकला की 30 वर्षीय महिला रूपा तिवारी है। जिन्हे 9 जनवरी की सुबह नसबंदी ऑपरेशन के लिये इलाकाई आशा संगिनी रूपा तिवारी का बीकापुर सीएचसी लायीं। उसका पंजीकरण कराया। उसके बाद उसकी बल्ड यूरिंन रक्तचाप जैसी तमाम जॉचें करवाने के बाद डॉक्टर की एडवाइज व रिर्पोट देखने के बाद आपरेशन करने आये डाक्टर डी.नाथ के निर्देश पर उसे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया। जहां डा0 डीनाथ ने आपरेशन के लिए चीरा लगया। फिर कुछ देर के बाद गेट पर खडे रूपा के देवर से डा0 डीनाथ ने बात की उसके बाद बिना नशबन्दी आपरेशन किये चीरे में टाका लगाकर उसे वापस आपरेशन थियेटर से बाहर निकाल दिया। 5 बच्चों की मॉ रूपा तिवारी के देवर का आरोप है कि आपरेशन करने वाले सर्जन ने सुविधा शुल्क न मिल पाने से उसकी भाभी रूपा का नसबंदी आपरेशन करने से मना कर दिया। अब यहां अहम सवाल यह है कि यदि डाक्टर पर लगे सुविधा शुल्क के आरोप को झूठा मान लिया जाय तो सवाल यह उठता है कि आपरेशन के पहले जॉच व सारी रिर्पोट देखने के बाद ही मरीज को आपरेशन थियेटर ले जाया जाता है। अगर कोई कमी मिली तो ओटी में ले जाने की क्या आवश्यकता है और यदि ओटी में ही जॉच होना जरूरी हुआ तो जॉच के बाद उसे क्यों नही वापस किया गया। कौन सी ऐसी बला आ गयी थी कि चीरा लगाकर पेट खोलने के बाद बिना आपरेशन चीरे पर टाका लगाकर वापस कर दिया गया। यह घटना सीएचसी बीकापुर से लेकर गॉव तक चर्चाओ में है तथा पीडित महिला के पति अमरनाथ तिवारी इस प्रकरण में नशबन्दी कैम्प में आने वाले सरकारी डा. डीनाथ पर आर्थिक दोहन का आरोप जडकर शिकायत के साथ साथ अदालत तक का दरवाजा खट खटाने को आतुर है। देखना है कि विभाग इस प्रकरण पर क्या रूख अपनाता है।

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