महापुरुषों की कृतियों का होना चाहिए प्रकाशन : नृत्य गोपाल दास

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एकाग्र संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का हुआ आयोजन

अयोध्या।  महापुरुषों की कृतियों का प्रकाशन होना चाहिए‚ इससे लोगों को प्रेरणा मिलेगी  यह आयोजन एक सराहनीय व स्वागत योग कार्य है। यह विचार राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष मणिराम दास छावनी के महंत नृत्य गोपाल दास ने नया घाट स्थित तिवारी मंदिर मे पंडित उमापति त्रिपाठी के 225वी जन्मोत्सव व स्मृति में आयोजित  एकाग्र संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किया। पंडित उमापति त्रिपाठी की स्मृति में प्रथम वशिष्ठ सम्मान सनातन वैदिक धर्म के प्रतिमान पंडित बिंदेश्वरी प्रसाद शुक्ल ब्रह्मचारी जी को₹21000 की धनराशि, मानपत्र व अंग वस्त्र प्रदान कर किया गया। वहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजनंदन ब्रह्मचारी  स्मृति सम्मान, अवध अंध विद्यालय कनीगंज के संचालक प्रज्ञाचच्छु संत अवधेश दास को ₹11000 मानपत्र व अंग वस्त्र प्रदान करके सम्मानित किया गया।
       कार्यक्रम के आयोजक तिवारी मंदिर के महंत गिरिश त्रिपाठी ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य अपनी संस्कृति व परंपरा को सहेजना और उससे प्रेरणा लेना है। अयोध्या से भगवान राम व महर्षि वशिष्ठ का संदेश संसार में जाना चाहिए। मुख्य अतिथि अवध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि पंडित उमापति जी के साहित्य का प्रकाशन होना चाहिए ।जिससे परंपरा का संरक्षण हो सके उन्होंने प्रकाशन का जिम्मा स्वयं उठाने का आश्वासन भी दिया। आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा की आयोजन का उद्देश्य उमापति जी की उपासना परंपरा का प्रकाशन करना है। यह उनकी तप स्वाध्याय की परंपरा का सम्मान है। इस अवसर पर डॉ कृष्ण कुमार मिश्र, डॉ जनार्दन उपाध्याय, शिरीष पति त्रिपाठी, नेपाली मंदिर के मंहत बालकृष्ण आचार्य, डॉ सुनीता शास्त्री, बड़े स्थान के महंत बिंदु गद्माचार्य देवेंद्रप्रसादाचार्य ने भी अपने विचार व्यक्त किए। समारोह के विशिष्ट अतिथि राज गोपाल मंदिर के महंत कौशल किशोर शरण फलाहारी जी महाराज रहे ,और संचालन आचार्य रघुनाथ दास त्रिपाठी ने किया।
     कार्यक्रम का मुख्य वक्तव्य गुरु शिष्य परंपरा पर देते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. कैलाश देवी सिंह ने कहा कि शिक्षा के व्यवसायीकरण में चरित्र पीछे चला गया है। पुरानी परंपरा का अवसान हो गया है। आज गुरु ज्ञानी भर रह गया, अन्य गुण विलुप्त हो गए हैं।  अतिथियों का आभार शरद कुमार त्रिपाठी व आये हुये अतिथियों का परंपरागत स्वागत देवेंद्रपति त्रिपाठी, आशीष त्रिपाठी, सचिन त्रिपाठी, हर्ष पांडे और बृजनंदन ब्रह्मचारी जी के परिवार के चंद्रशेखर पांडे व चंदेश्वर पांडे ने किया। इस अवसर पर लक्ष्मण किला के महंत मैथिली रमन शरण, सद्गुरु सदन के मंहत सिया किशोरी शरण, राधेश्याम शास्त्री, साहित्यकार यतींद्र मिश्र, साकेत के प्रधानाचार्य अजय मोहन श्रीवास्तव, अवध विश्वविद्यालय के कुलसचिव एसएन शुक्ला, महंत हरिदास, एमबी दास, राजू दास, राम लखन दास, आचार्य दिनेश, दिलीप दास, राजकुमार दास, डॉ परेश पांडे, डॉ सुधाकर राय, अशोक टाटम्बरी, डॉ रामकृष्ण मिश्रा, डॉ बीडी द्विवेदी, रमेश सिंह, जानकी कुंज के महान वीरेन्द्र दास, सुनील शास्त्री,  सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
      वशिष्ट उपाधि से सम्मानित पं उमापति त्रिपाठी का जन्म 1794में देवरिया जनपद के पिंडी ग्राम में हुआ। आप दिग्विजय विद्वान के रूप में संपूर्ण देश में समादृष्ट हुए। आपने कोविद उपनाम से संस्कृत व हिंदी में विशिष्ट रचनाएं की हैं। आपने श्री राम को राजकुमार रूप में अपना शिष्य तथा स्वयं को गुरु मानते रहे। आज भी पं उमापति त्रिपाठी जी के बारे में अयोध्या में यह कथा प्रचलित है कि आप प्रभु श्री राम की हमेशा आशीर्वाद देते थे, एक बार लोगों के कहने पर आप कनक भवन गए और भगवान का शीश झुक गया और उनके विरुद्ध का मुकुट गिर गया। यही कारण है कि आप कभी प्रभु श्री राम के मंदिर नहीं गये बल्कि प्रभु श्री राम को हमेशा आशीर्वाद देते हैं। आपने अयोध्या में तीन शिखरों वाले  मंदिर का निर्माण कराया जो आज तिवारी मंदिर के नाम से जाना जाता है ।आप की ऐतिहासिक जीवन लीला सन 1873 संपन्न हुई।  उन्हीं के उत्तराधिकारी महंत गिरीश पति त्रिपाठी द्वारा आज वशिष्ठ सम्मान पंडित विंदेश्वरी प्रसाद शुक्ल ब्रह्मचारी जी को प्रदान किया गया जो लगभग 100वर्ष के होने वाले हैं ब्रह्मचारी जी का जन्म बस्ती जनपद के भीखी पकड़ी गांव में हुआ आपने अपना पूरा जीवन भारतीय जीवन शैली में जिया। आप वेद, व्याकरण ,गणित के प्रकांड विद्वान हैं ।आज अयोध्या में ही नहीं बल्कि विश्व में व्याकरण के ऐसे  विद्वान यदा कदा मिलेंगे। भारतीय स्वतंत्रता के योद्धा श्री बृजनंदन ब्रह्मचारी का जन्म सिद्धार्थनगर जनपद में हुआ।  आप विद्या अध्ययन के लिए अयोध्या आए और तिवारी मंदिर में रहकर विद्या अध्ययन करने लगे। विद्या अध्ययन काल में ही आपने सेनानी की भूमिका निभाई 1923 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की अयोध्या में बैठक हुई और युवा क्रांतिकारी में ब्रह्मचारी जी सम्मिलित हुआ 1929 में दिल्ली के सेंट्रल जेल में ब्रह्मचारी जी महा मना के साथ रहे। बृजनंदन ब्रह्मचारी सम्मान अवध अंध विद्यालय के संस्थापक प्रज्ञाचच्छु संत अवधेश दास जी को दिया जा रहा है। जो अयोध्या में अंध विद्यार्थियों के पालनहार बने हुए हैं।
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