प्राचीन कलाकृतियों को संरक्षित करने की आवश्यकता: डाॅ. जनार्दन उपाध्याय

विश्व धरोहरों के रूप में संग्रहालयों की उत्पत्ति, महत्व एवं प्रासंगिकता विषय पर हुआ व्याख्यान

अयोध्या। अन्तर्राष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के शैक्षिक कार्यक्रमों के अन्तर्गत विश्व संग्रहालय दिवस के अवसर पर ‘‘विश्व धरोहरों के रूप में संग्रहालयों की उत्पत्ति, महत्व एवं प्रासंगिकता‘‘ विषय पर व्याख्यान का आयोजन संग्रहालय के सभागार में किया गया जिसमें वक्ता के रूप में डाॅ. देशराज उपाध्याय, म्यूजियोलाॅजिस्ट, डाॅ0 राम मनोहर लोहिया अवध विश्व विद्यालय तथा अध्यक्षता नाका हनुमानगढ़ी के महन्त रामदास द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। इस अवसर पर डाॅ0 उपाध्याय ने संग्रहालय (म्यूजियम) शब्द की व्याख्या की जिसमें उन्होेंने बताया कि संग्रहालय वह स्थान है जहाँ मानव की उपयोगिता की वस्तुओं का प्रदर्शन वातावरण के अनुरूप इस प्रकार किया जाय जिससे शैक्षणिक ज्ञान प्राप्त हो। उन्होंने बताया कि मानव जबसे यायावर जीवन को त्याग कर स्थायी जीवन जीना प्रारम्भ किया तब से संचय या संग्रह की प्रवृत्ति पैदा हुई। भारत में संग्रहालय आन्दोलन का सूत्रपात 18वीं शती में अंग्रेजों द्वारा हुआ जो आज तक चलायमान है। मुगलों के समय में पुस्तकों तथा चित्रों के संग्रह के लिए कुतुबखाना तथा तस्वीरखाना आदि स्थापित होते थे। अजन्ता एवं एलोरा तथा एलीफैन्टा की गुफाऐं भी संग्रहालय के विचार को पूरा करतीं थी। उन्होंने संग्रहालय के मुख्य कार्य संग्रहण, वर्गीकरण, संरक्षण, शोध एवं प्रदर्शन पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि साकेत महाविद्यालय, अयोध्या के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डाॅ0 जनार्दन उपाध्याय ने संग्रहालयों की उपयोगिता एवं आवश्यकता तथा प्राचीन कलाकृृतियों को संरक्षित करने की आवश्यकता बतायी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नाका हनुमानगढ़ी के महन्त राम दास ने नष्ट हो रही प्राचीन कलाकृतियों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि जनता को इसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता है क्योंकि हमारे देश की वेशकीमती मूर्तियाँ जब हमारी लापरवाही के कारण तस्करों के हाथ लग जाती हैं तो वे करोड़ों रूपये में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बेच देते हैं जिसे पुनः उस प्रकार की मूर्तियाँ जिसमें हमारी कला एवं प्राचीन संस्कृति की झलक दिखाई देती है उससे हम हमेशा के लिए वंचित हो जाते हैं और उनकी प्रतिपूर्ति संम्भव नहीं हो पाती। उन्होंने हमारे नष्ट हो रहे पौराणिक कुण्डों के संरक्षण के लिए उपस्थित जन समुदाय से आग्रह किया एवं उस कार्य में यथा सम्भव अपना सहयोग प्रदान करने की बात कही। कार्यक्रम में कवि, पत्रकार एवं अयोध्या, फैजाबाद के अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति सराहनीय रही। कार्यक्रम के अन्त में अन्तर्राष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के उपनिदेशक योगेश कुमार ने आये हुए अतिथियों का आभार व्यक्त किया तथा राष्ट्रगान के पश्चात कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

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