-तारीफ पाना व करना, दोनो है मनोस्वास्थ्य-पूरक, सच्ची तारीफ व चापलूसी में है सूक्ष्म विभेद
अयोध्या। कॉम्प्लीमेंट या सच्ची तारीफ़ द्विगामी ब्रेन बूस्टर है जिससे मोटिवेशन, इमोशनल बॉन्डिंग व मेंटल हेल्थ मे इज़ाफ़ा होता है। इतना ही नही,नकली तारीफ़ या चापलूसी और दिल से की गई तारीफ़ के बीच का फर्क दिमाग़ तुरंत समझ जाता है।
न्यूरोइमेजिंग स्टडीज से पता चला है कि सच्ची तारीफ़ से दिमाग का प्लेज़र सेंटर न्यूक्लियस अकम्बंस ज़बरदस्त तरीके से एक्टिवेट होकर है आनंद और खुशी की अनुभूति कराता है। स्वार्थवश की जाने वाली झूठी तारीफ़ या चापलूसी को ब्रेन फेक सिग्नल मानकर रिवॉर्ड सर्किट्स को स्विच ऑफ कर देता है।
सोशल अप्रूवल या तारीफ़ मिलने पर ब्रेन स्ट्रिएटम एक्टिवेट होता है जिससे रिवॉर्ड फीलिंग मिलती है। तारीफ के शब्दों को दिमाग प्राइमरी ऑडिटरी कॉर्टेक्स और सुपीरियर टेम्पोरल जाइरस के माध्यम से डिकोड के उपरान्त ब्रेन स्कैनर वेंट्रोमेडियल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और सेलियन्स नेटवर्क एक्टिवेट होने से खुशी व मोटिवेशन हार्मोन डोपामाइन के साथ निकले नॉरइपेनेफ्रिन केमिकल इस फीलिंगपर मेमोरी टैग लगा देता है।
तारीफ है द्विगामी असरकारी
तारीफ पाने ही नही, करने से भी प्रो-सोशल ब्रेन-इफेक्ट होता क् जिसे न्यूरोसाइंस में विकैरियस ब्रेन-रिवॉर्ड कहते हैं। तारीफ़ के आदान-प्रदान से दिमाग में केमिकल कॉकटेल रिलीज होता है जिसमे मोटिवेशन व खुशी देने वाला हार्मोन डोपामाइन,रिश्तों को मजबूत करने वाला ऑक्सीटोसिन,डिप्रेशन व एंग्जायटी को कम करने वाला सेरोटोनिन तथा मनोशरीरिक दर्द निवारक इन्डॉर्फिन होता है। वास्तविक व गैर-भौतिक मौखिक प्रशंसा के माध्यम से सकारात्मकता, मानवीय जुड़ाव और मेन्टल हेल्थ प्रमोशन के उद्देश्य “वर्ल्ड कॉम्पलीमेंट डे”-1 मार्च, को सामाजिक-संवाद में कम से कम तीन सच्ची तारीफें करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जिला चिकित्सालय के मन-कक्ष में आयोजित “मनोस्वास्थ्य के संवादीय आयाम” विषयक कार्यशाला में यह बाते डा आलोक मनदर्शन ने कही।