“खतरे में बचपन” : बढ़ रही है उद्दंड व फिसड्डी (एडीएचडी) बच्चो की भीड़

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 उद्दंड व फिसड्डी बच्चा, मां के गर्भकालीन तनाव का नतीजा ः डाॅ. आलोक मनदर्शन

फैजाबाद। उद्दंड, फिसड्डी व अराजक बच्चो की भीड़ बढ़ रही है | इसके पीछे माताओं का गर्भ काल में अवसाद में होना पाया गया है। ऐसे बच्चे मेडिकल भाषा में अटेंशन डिफिसिट हाइपरएक्टिव डिसऑर्डर (ADHD) से ग्रसित है। मनदर्शन मिशन व किशोर मित्र क्लीनिक के संयुक्त तत्वाधान में कराये गये एक सर्वे के नतीजे में यह तथ्य सामने आया है । 500 माताओं व बच्चो पर किये गये सर्वेक्षण के बाद जो नतीजा सामने आया है उसके अनुसार गर्भवती माताएं किन्हीं कारणों से अवसादग्रस्त रहीं। किशोर मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन’ बताते है कि ऐसा बच्चा स्थिर नहीं रहता। सामान इधर-उधर फेंकता रहता है। जरा-जरा सी बात में तोड़-फोड़ करता रहता है। मारपीट पर उतर आता है। खुद को चोटिल कर लेता है। हर वक़्त बक-बक करता रहता है। बड़ों जैसी बाते करता रहता है। आपके समझाने व डांट-डपट का कोई असर नहीं पड़ता। पढाई में मन नहीं लगता और अनचाही चीजो को बहुत जल्दी याद कर लेता है। शरारतें, शिकायतों के बाद पिटाई से भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। यह डिसऑर्डर लड़के व लड़कियों में समान रूप से पाया गया है।            अभिभावकों ने अपने बच्चों में ऐसे लक्षणों का होना बताया है। अभिभावकों से बातचीत के दौरान इन बच्चों की माताओं ने गर्भकालीन तनाव व अवसाद होने की स्थिति को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वीकार किया। इस प्रकार ADHD बच्चे (अति चंचल बाल व्यवहार)व माँ के गर्भकालीन तनाव में 95 प्रतिशत विश्वसनीयता स्तर  (कान्फीडेंस लेबल) पर सबल धनात्मक सह-सम्बन्ध (स्ट्रांग पाजिटिव को-रिलेशन) पाया गया है। इस शोध रिपोर्ट के माध्यम से ऐसे बच्चों के व्यवहार पर जल्द से जल्द ध्यान देने की आवश्यकता पर बल दिया गया है ताकि समय रहते मनोउपचार से उसके व्यवहार को नियन्त्रित कर स्वस्थ मानसिक स्थिति में लाया जा सके। साथ ही उनमे स्थिरता व एकाग्रता विकसित हो सके ताकि उनकी मानसिक उर्जा का सदुपयोग उनकी पढाई-लिखाई व अन्य रचनात्मक कार्यों में किया जा सके। ध्यान न देने पर ऐसे बच्चों के आगे चलकर उद्दंड, फिसड्डी, अनैतिक, आपराधिक, व असमाजिक गतिविधियों में लिप्त होने की आशंका बनी रहती है |  ज़िला चिकित्सालय के किशोर मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन’ ने अफ़सोस जाहिर करते हुए बताया कि दुर्भाग्य की बात यह है कि अभिभावक ऐसे बच्चे के इस व्यवहार को नजरअंदाज करते जाते है कि आगे चलकर वह अपनेआप ठीक हो जायेगा, पर होता बिलकुल इसके विपरीत है।

बचाव :

गर्भकाल के दौरान माताएं किसी प्रकार के तनाव की स्थिति से बचे तथा पूरी नींद के साथ खुशहाल एवं मनोरंजन गतिविधियों को प्राथमिकता दें तथा गर्भकालीन तनाव ज्यादा बढ़ने पर मनोचिकित्सकीय परामर्श अवश्य लें ।

उपचार :

बच्चों के शुरूआती लक्षणों को जल्द से जल्द पहचान कर मनोचिकित्सक से सलाह लेकर उपचार करायें तथा मनोचिकित्सकीय तकनीक व तरीको के अनुसार पेरेंटिंग पैटर्न व पारिवारिक माहौल में अपेक्षित बदलाव करें तथा नियमित रूप से मनोवैज्ञानिक सलाह लेते रहें।
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