शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती पर अर्पित की गयी श्रद्धांजलि

नौजवानों के यूथ आइकान थे भगत सिंह: सत्यभान सिंह

फैजाबाद।भारत की जनवादी नौजवान सभा,इंकलाबी नौजवान सभा व वामपंथी दलों के संयुक्त तत्वावधान में  शहीद ए आजम भगतसिंह के 111वें जन्मदिन पर नगर निगम कार्यालय पर स्थिति भगतसिंह पार्क में श्रद्धांजलि अर्पित जिलाध्यक्ष कामरेड  धीरज द्विवेदी के नेतृत्व में किया गया।उसके बाद सभा किया गया।सभा की अध्यक्षता जिलाप्रभारी कामरेड विश्वजीत सिंह राजू ने किया और संचालन जिलासचिव कामरेड शेर बहादुर शेर ने किया। सभा को संबोधित करते हुए जनौस के प्रदेश उपाध्यक्ष कामरेड सत्यभान सिंह जनवादी ने कहा कि नौजवानों के ‘यूथ आइकन’ थे भगत सिंह, देश की आजादी से कर ली थी शादी।आज भी जब हमें भगत सिंह का नाम सुनाते हैं तो सबसे पहले हम अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात सोचने लगते हैं, क्योंकि देश के सबसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर शहीद भगत सिंह भारत की उन महान विभूतियों में बहुत महत्वपूर्ण दर्जा रखते हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपना बलिदान दे दिया. मात्र 23 साल की उम्र में भगत सिंह ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.यही वजह थी कि अमर शहीद भगत सिंह स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में नौजवानों के लिए यूथ आइकन थे, जो देश के हर नौजवान को भारत की आजादी में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते थे. भगत सिंह का जन्म एक सिख परिवार में जरंवाला पंजाब में 27 सितंबर 1907 को हुआ था. वो बचपन से उन्होंने अपने आसपास अंग्रेजों को भारतीयों पर जुर्म करते देखा. जिसके चलते कम उम्र में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात उनके मन में घर कर गई।

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कामरेड सुनील सिंह ने कहा कि भगत सिंह सोचते थे कि नौजवान देश का काया पलट कर सकते हैं. इसीलिए उन्होंने देश के नौजवानों को एक नई दिशा दिखाने की कोशिश की. उनका पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा. आज भी देश के नौजवान उनके जीवन संघर्ष से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। डाक्टर अनिल कुमार सिंह ने कहा कि भगत सिंह सिख परिवार में पैदा हुए थे. उनके जन्म के वक्त उनके पिता किशन सिंह जेल में बंद थे. भगत सिंह ने बचपन से ही अपने घर वालों में देशभक्ति का जज्बा देखा. उनके चाचा अजित सिंह बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी. जिसमें उनके साथ सैयद हैदर रजा भी थे. अंग्रेजी हुकूमत ने भगत सिंह के खिलाफ 22 केस दर्ज किए थे. जिनसे बचने के लिए उन्हें ईरान जाना पड़ा.  जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन का खुलकर समर्थन किया. उसके बाद भगत सिंह ने खुलेआम अंग्रेजों को ललकारना शुरु कर दिया। जब वो लाहौर के नेशनल कॉलेज से BA कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात सुखदेव, भगवती चरण और कुछ अन्य लोगों से हुई. उन दिनों आजादी की लड़ाई जोरों पर थी. देश की खातिर भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और पूरी तरह से आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. इन्हीं दिनों में उनके परिवार ने उनके सामने शादी करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन भगत सिंह ने भारत की स्वतंत्रता के लिए शादी करने से इंकार कर दिया. उन्होंने अपने परिवार से कहा, “अगर आजादी से पहले शादी करूं तो मेरी दुल्हन की मौत हो जाए.” भगत सिंह बहुत अच्छे एक्टर थे और वो बहुत से नाटकों में भाग भी लिया करते थे. उनके नाटकों की स्क्रिप्ट पूरी तरह से देशभक्ति से परिपूर्ण होती थी. जिसमें वो कॉलेज के नौजवानों को आजादी के लिए आगे आने के लिए प्रोत्साहित करते थे. साथ ही नाटकों के जरिए अंग्रेजों को नीचा दिखाया करते थे। कामरेड शिवधर द्विवेदी ने कहा कि भगत सिंह बहुत मस्त मौला इंसान थे, उन्हें लिखने का बहुत शौक था. इसीलिए उन्हें निबंध में बहुत से प्राइज मिला करते थे. पूरी तरह से देश के लिए समर्पित होने के बाद भगत सिंह ने सबसे पहले नौजवान भारत सभा ज्वाइन की. जब उनके परिवार ने उन्हें यकीन दिलाया कि अब वे उनसे शादी के बारे में बात नहीं करेंगे तो भगत सिंह अपने घर लाहौर लौट गए।
कामरेड पूजा शर्मा ने कहा कि भगत सिंह इस मैगजीन के जरिए देश के नौजवानों तक अपना संदेश पहुंचाते थे. भगत सिंह बहुत अच्छे लेखक थे, जो पंजाबी उर्दू-पेपर के लिए लिखा करते थे. 1926 में नौजवान भरत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया गया. इसके बाद 1928 में उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ज्वाइन कर ली. जो मौलिक पार्टी थी।
कामरेड अतीक अहमद ने कहा कि भगत सिंह अपने आप को शहीद कहा करते थे. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर मुकदमा चलाया गया. जिसमें उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. कोर्ट में भी तीनों इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे।
सीपीआई के प्रांतीय नेता कामरेड अशोक तिवारी ने कहा कि भगत सिंह को जेल में बहुत यातनाएं दी गईं. उन्हें ना अच्छा खाना दिया जाता था और ना ही कपड़े. तब कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने जेल के अंदर ही आंदोलन शुरु कर दिया। कामरेड अफाक ने कहा कि उन्होंने अपनी मांगें पूरी करवाने के लिए कई दिनों तक अन्न और पानी का त्याग कर दिया. जिसके लिए पुलिस ने उनपर तमाम अत्याचार किए और तरह-तरह की यातनाएं भी दीं।  कामरेड एस एन बागी ने कहा कि भगत सिंह अंग्रेजों के सामने झुकने वाले कहां थे. आखिर में 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई. इस तरह तीनों हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए। कार्यक्रम में  सीपीआई जिलासचिव कामरेड रामतीरथ पाठक ,सुनील सिंह,लतीफ अहमद रेशमाबानो, आशीष,दीपक कुमार,मोहम्द अली,गुफरान सिद्दीक,बिजेंद्र श्रीवास्तव,अमरनाथ वर्मा,शहंशाह,ओमकार नाथ पांडेय,पूजा शर्मा,उमाकांत विश्कर्मा,माधुरी,अनिता,कंचन,माकपा नेता कामरेड रामजी तिवारी आदि कई साथी मौजूद रहे।

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