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रामनवमी विशेष : सिया राम मय सब जग जानी….

राम भारतीय जनमानस की आस्था और मानवोचित धर्म की मर्यादा के सर्वोच्च आदर्श हैं ।राम नाम की महिमा का आरंभ और अंत नहीं लिखा जा सकता ।अर्जित ज्ञान के आधार पर तर्क, विज्ञान ,दर्शन के सापेक्ष विश्लेषण कर राम शब्द की महत्ता को समझने का प्रयास किया है इस लेख में।

ब्रह्म और प्रकृति का संगम हैं राम-

“राम” शब्द उस परमब्रह्म परमेश्वर , जो निराकार, अनन्त, अखण्ड, सर्वव्यापी शक्ति , का बोध कराता है जो इस भौतिक जगत में देश ,काल, परिस्थिति की आवश्यकतानुसार निराकार से साकार रूप धारण कर सम्पूर्ण जगत के कल्याणार्थ अपनी बनाई हुई प्रकृति के नियमानुसार विभिन्न क्रियाओं का सम्पादन करती है।
“राम” का स्वरूप तो निराकार है किंतु यही “निराकार” जब सांसारिकता को धारण करते हुए प्रकृति को प्रकट करता है तो प्रकृति का वह रूप जिसमे स्वरूप व्याप्त रहता है  उसे ही राम का साकार स्वरूप कहते हैं। इसी प्रकार साकार में व्याप्त निराकार की प्रेरणा से संचालित सांसारिक क्रिया ही इस संसार मे ब्रह्म की लीला है।अर्थात ब्रह्म और प्रकृति का समन्वय ही जगत में “राम” है।
देवनागरी लिपि में  अक्षर का अर्थ है जिसका क्षरण न हो सके अर्थात प्रत्येक अक्षर स्वयं एक भाव लिए हुए सार्थक है। इसी आधार पर
” र ” अक्षर  तेज , शक्ति, प्रकाश आदि भावों के लिए प्रयुक्त होता है जिसपर “T” मात्रा इसमे आकार, शक्ति ऊर्जा का ऊर्ध्व गामी स्वरूप का भाव प्रस्तुत करती है, तदनुरूप ही “म” अक्षर प्रकृति तत्व हेतु प्रयोग किया जाता है। इन्ही अक्षरों के  संयोग से “राम” नाम के सार्थक भाव को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।सृष्टि की प्रत्येक रचना का कोई न कोई आकार है यहां “आ” “र” और “म” को आकार देता है तो राम का प्राकट्य होता है। कह सकते हैं “म”  रूपी प्रकृति में “र” रूपी तेज व्याप्त हो  “राम” का आकार लेते हैं जिसमे ही सब व्याप्त है या यूं कहिये जो सबमे व्याप्त है।
सम्भवतः इन्हीं भावों से ओतप्रोत गोस्वामी तुलसीदास जी को समस्त सृष्टि या “सब जग” “सियाराममय”दिखता है ।
श्रीराम चरित मानस की चौपाई में गोस्वामी लिखते है –
“सियाराममय सब जग जानी।
करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी।”
आध्यात्मिक दृष्टि इन शब्दों के भावार्थ में प्रकृति के प्राकट्य और विलय की गूढ़ प्रक्रिया खोजती है।

पदार्थ और ऊर्जा का अन्तरपरिवर्तन सिद्धांत-

 वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास करें तो वैज्ञानिक आइंस्टाइन के सूत्र E=mc2 के अनुसार ऊर्जा और पदार्थ के एक दूसरे में परिवर्तनशील होने का संकेत मिलता है। प्रयोग के समय आइंस्टीन ने जब परमाणु को दो भागों में विभाजित किया तो पाया कि विभक्त परमाणु का भार मूल परमाणु से कम था , जबकि दोनों का योग मूल भार के बराबर होना चाहिए था, तो प्रश्न स्वाभाविक है कि पदार्थ में यह कमी कैसे आयी होगी?…गहन चिंतन और प्रयोगों से आइंस्टीन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि परमाणु के टूटते समय एक प्रकाशपुंज निकलता है जो अंततः अनन्त में विलीन हो जाता है, यही उस पदार्थ में कमी का कारण है। ऊर्जा और द्रव्यमान के अन्तरपरिवर्तन के साथ आइंस्टीन ने यह भी बताया कि आकाश रिक्त नही अपितु शांत ऊर्जा (स्थिर) से भरा है।
यदि इस अन्तरपरिवर्तन की इस प्रक्रिया का एक मार्गी विवेचन करें तो एक समय ऐसा सम्भव है कि जब ब्रह्मांड समस्त प्रक्रियाओं से गुजरते हुए इस अनन्त आकाश की स्थिर ऊर्जा में विलीन हो जाता हो, सनातन शास्त्र जिसे आत्यंतिक प्रलय कहता है।

ऊर्जा का रूपांतरण और सृजन-

इस अनन्त आकाश की स्थिर ऊर्जा का एक अंश अचानक गतिशील ऊर्जा में परिवर्तित होने लगता है और जब यह गतिज ऊर्जा एक जगह घनीभूत होती है तो एक महानाद या महस्फोट ( बिग-बैंग) होता है और एक धधकता हुआ आग का गोला उपस्थित होता है जो गतिज ऊर्जा के प्रभाव से अपने केंद्र पर चक्रमण करने लगता है, जिसके प्रभाव से इसके कुछ अंश विकेन्द्रित हो दूर छिटक जाते हैं और उसके चारों तरफ घूमने लगते हैं इसकी व्यापक प्रक्रिया में जो संरचना उपस्थित हुई सम्भवतः वही सौरमण्डल है।
वस्तुतः पदार्थ के सूक्ष्मतम परमाणु से सौरमण्डल तक सभी की मूल संरचना एक जैसी है।
ऊर्जा व पदार्थ के अन्तरपरिवर्तन की इस वैज्ञानिक परिकल्पना को भारतीय आध्यात्मिक चिंतन की कसौटी पर परखते हैं तो वह बिंदु, जहां अनन्त आकाश (ब्रह्म , स्थिर ऊर्जा) से गतिज ऊर्जा (योगमाया) संघनित होकर महस्फोट (नाद) से सर्वप्रथम आग का गोला अर्थात सूर्य का निर्माण होता है, उसे “ज” कहते है। इसी बिंदु से सृष्टि की रचना होकर कालचक्र में भ्रमण करते हुए जब आत्यंतिक प्रलय को प्राप्त करती है उस बिंदु को “ग” कहते हैं। अतः “ज” अक्षर का भाव जन्म लेने या उत्पत्ति से सम्बंधित है, एवं “ग”अक्षर में विलय, गमन कर जाने या अंत का भाव है । स्पष्ट है कि “ज” (उत्पत्ति) और “ग” (विलय)  के दो बिंदुओं के समूह को ही “जग” कहा गया है , जिनके मध्य ही यह सारा संसार (सभी तत्व) रहता है।
गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई में “जग”  उत्पत्ति से लेकर आत्यंतिक प्रलय तक की प्रकृति के समस्त रूप व प्रक्रियाएं उस अनन्त आकाश (स्थिर ऊर्जा, ब्रह्म) का ही अंश हैं।
इसी “ज” बिंदु से निराकार (योगमाया) साकार (प्रकृति)  का रूप धारण करती है जिसमे वह परमब्रह्म (राम) ठीक उसी प्रकार व्याप्त रहता है जैसे देवनागरी लिपि के “व्यंजनों” में “स्वर”।
सृष्टि की रचना की प्रक्रिया में “ज”  बिंदु से द्वैतभाव का प्रारम्भ होता है और “ग”तक व्याप्त रहता है।

प्रकृति : द्वैतभाव

परमब्रह्म की अंतःप्रेरणा से जो शांत (स्थिर) ऊर्जा गतिशील होकर सृष्टिरचना में लीन होती है उसी का भाषित भाव है प्रकृति, जो स्वयं को दो भागों में विभाजित कर लेती है। पहला  रूप है “जड़”, जहां स्थिरता, गतिहीनता के गुण विद्यमान है, व दूसरा रूप है “चेतन” जो जीवों में चेतना के रूप में विद्यमान है।
उपरोक्त दर्शन से स्पष्ट होता है कि (ब्रह्म)  राम में “र” तेज स्वरूप पुरुष तत्व है, और इसी ब्रह्म से उत्पन्न प्रकृति को “म” अर्थात “सिया” कहते हैं। इसी तरह जीव के भी दो भाव हैं पहला शरीर अर्थात सिया और दूसरा इसमे व्याप्त चेतना अर्थात चेतन तत्व राम। अस्तु प्रकृति और पुरुष का चेतन साकार स्वरूप हैं राम।

रामायण का अर्थ है राम +आयन अर्थात राम का घर

शास्त्र कहते हैं “रामायण शतकोटि अपारा” अर्थात रामायण अनन्त है । गोस्वामी जी ने उसी अनन्त रामायण में से एक रामायण (राम का घर) अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम का वर्णन किया जिसका नाम “राम चरित मानस” रखा है, अर्थात जिसके अध्ययन मात्र से हमारा मानस राम जैसा हो जाय और शरीर से जो चरित्र प्रकट हों वह राम के चरित्र हों।

 

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-डा. उपेन्द्रमणि त्रिपाठी, होम्योपैथ

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