-आत्महत्या के विचार का करें ससमय उपचार, छात्र आत्महत्या बन गयी है महामारी

अयोध्या। मनोस्वास्थ्य जागरूकता का अभाव,परिस्थितियों से अनुकूलन की क्षमता में कमी तथा दुनिया को केवल काले और सफेद में देखने की मनोवृत्ति तथा अवसाद व अन्य मनोरोग, अति अपेक्षावादी माहौल,अकादमिक व कैरियर प्रेशर,लव लाइफ इवेंट,नशा व जुआ आदि युवा आत्मघात के मुख्य कारक पहलू है। आत्मग्लानि व हताशा के चरम पर आत्मघात के विचार पहले अक्रिय रूप में आते है, जिसमे किसी दुर्घटना या बीमारी आदि से जीवन समाप्त हो जाने की रुग्ण प्रत्याशा होती है,पर कुछ समय पश्चात सुसाइड की इच्छा सक्रियरुप में आत्मघाती कृत्य की तरफ मादक खिचाव पैदा कर देती है। इस खिचाव को आत्मघाती मनोअगवापन कहा जाता है। देश में छात्र आत्महत्या के आंकड़े 4 प्रतिशत वृद्धि दिखा रहें हैं, जबकि प्रतिवर्ष कुल 1.72 लाख यानि प्रति घंटे 20 आत्महत्या का आंकड़ा है। 15 से 29 आयु वर्ग में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या बन चुका है क्योंकि प्रति घंटे एक छात्र आत्महत्या हो रही है।
रोकथाम व पुनर्वास :
छात्र आत्महत्या के कृत्य से बचाने का फर्स्ट एड करीबी मित्रों, परिजनों व शैक्षिक संस्थान के मार्गदर्शको की सूझ बूझ ही होती है। आत्मघाती कृत्य पर अमादा व्यक्ति कुछ परोक्ष व बारीक अभिव्यक्ति शुरु कर देता है। ज़रूरत है इन सूक्ष्म मनोभावों को समय रहते संज्ञान में लेने की मनोदक्षता की। इस मनोदक्षता का उपयोग व्यक्ति के आत्महत्या के विचार पर इंस्टेंट ब्रेक लगाने व सतर्कता के साथ मनोउपचार व पुनर्वास में किया जाना चाहिये। शैक्षिक-संस्थान सुसाइड जागरूकता श्रृंखला के तहत राजा मोहन मनूचा पी जी कॉलेज में आयोजित कार्यशाला मे यह बाते डा आलोक मनदर्शन ने बतायी। प्राचार्या प्रो मंजूषा मिश्रा की अध्यक्षता में आयोजित सत्र का संयोजन मेन्टल हेल्थ क्लब नोडल अधिकारी प्रो सुषमा पाठक व एनएसएस ऑफिसर डा पूनम शुक्ला ने किया। सत्र में शिक्षक मंडल व छात्राओं ने प्रतिभाग किया।