-किशोरावस्था में शुरु होती है दो-तिहाई लत, निकोटिन-रिप्लेसमेंट थेरैपी है लत छोड़ने मे सहायक
अयोध्या। नवयुवतियों में भी तम्बाकू-जनित छद्म-शुकून व मौज-मस्ती की आसक्ति चिंताजनक रूप से बढ़ रही है,जिसमें स्टूडेंट्स,प्रोफेशनल्स व ग्लैमरस इंडस्ट्री की अधिकता है। तम्बाकू सेवन से ब्रेन न्यूक्लियस में हैप्पी हार्मोन डोपामिन की बाढ़ आ जाती है और मस्ती का एहसास होने लगता है। फिर डोपामिन का स्तर सामान्य होने पर हिप्पोकैम्पस द्वारा डोपामिन की तलब पैदा होती है जिसे निकोटिन- डिपेंडेंस भी कहा जाता है। इस प्रकार नशे की मात्रा बढ़ती जाती है जिसे निकोटिन-टोलेरेन्स कहा जाता है।
मनोविकार- ग्रसित,नशे की पारिवारिक पृष्ठभूमि या मित्रमण्डली से सरोकार प्रमुख रिस्क फैक्टर हैं। एक स्टडी के अनुसार, दो तिहाई तंबाकू यूजर्स की लत किशोरवस्था में ही शुरु होती है। तम्बाकू सेवन के शॉर्ट टर्म दुष्प्रभावों में एकाग्रता की कमी, पढ़ाई में मन न लगना,आँखों का धुंधलापन, चिड़चिड़ापन,भूख कम या ज्यादा लगना, अनिद्रा, साइबर सेक्स व गेम में मस्त रहना, रैस ड्राइविंग, अति यौन उत्तेजना जैसे व्यवहार दिखतें हैं। लॉन्ग टर्म दुष्प्रभाव में विभिन्न कैंसर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हड्डी रोग,फेफड़ा रोग, हृदय रोग व नपुंसकता आदि प्रमुख हैं।
तंबाकू-निषेध दिवस -2026 का विषय है “खतरनाक प्रभाव व लुभावनी पैकिंग तम्बाकू-उत्पाद से रहें सतर्क”। यह बाते विश्व तम्बाकू-रोधी दिवस- 31 मई को वार्ता में डा आलोक मनदर्शन ने कही। बिहैवियर-थिरैपी व निकोटिन-रिप्लेसमेंट थेरैपी लत से उबारने में कारगर है । इससे निकोटिन तलब की लाक्षणिक पहचान के साथ लत न पूरी होने पर होने वाले समस्याओ यानि विद्ड्राल इफेक्ट को रोकने में भी मदद मिलती हैं तथा कुछ ही हफ्तों में लत से निजात मिल जाती है। राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के तहत तंबाकू-सेवन रोकथाम प्रयास के साथ ही “सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम-2003 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान, विज्ञापन, नाबालिगों को बिक्री और शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर बिक्री पर रोक को सख्ती से लागू किया जा रहा है।