-दोस्तों का साथ देता है स्ट्रेस-एंग्जायटी को मात, मौज-मस्ती तक सीमित है, ज़ेन-ज़ी दोस्ती
अयोध्या। मित्रों की संगत से मनोरसायनिक बदलाव होने शुरु हो जाते है जिसके सकारात्मक मनोप्रभाव होते हैं। दोस्तों संग बातचीत व हंसी ठिठोलीं न केवल मनोतनाव पैदा करने वाले मनोरसायन कॉर्टिसाल के स्तर को कम करते है बल्कि हैप्पी-हार्मोन सेराटोनिन व डोपामिन तथा आत्मीयता व आनन्द की अनुभूति वाले हार्मोन आक्सीटोसिन व एंडोर्फिन को बढ़ावा देते हैं जिससे स्फूर्ति, उमंग, उत्साह ,आनन्द व आत्मविश्वास का संचार होता है।
अच्छे दोस्तों से मनोसंयम के लिये ज़िम्मेदार हार्मोन सेराटोनिन मे वृद्धि होती है जिससे रुग्ण-मनोवृत्तियों व व्यसन पर अंकुश लगाने मे मदद मिलती है । दोस्तों संग घूमने फिरने व मनोरंजक गतिविधियों से संवर्धित होने वाला मनोरसायन ऑक्सीटोसिन आत्मीयता व प्यार का संचार करता है जिसे मनोविश्लेषण की भाषा में फ्रेंडशिप-यूफोरिया या मैत्री-मनोआनन्द कहा जाता है जिससे प्रो सोशल ब्रेन एक्टिवेट होकर रिवॉर्ड सर्किट कम्प्लेटे होने व मन की बात शेयर करने से स्वस्थ्य मनोरक्षा-युक्ति का संचार होता है जिससे तनाव अवसाद व चिंता विकार से उबरने में मदद मिलती है। मैत्री-भाव का अभाव या मैत्री के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण गंभीर मनोरुग्णता की तरफ ले जा सकता है।
इस प्रकार फ्रेंडशिप के इमोशन स्वस्थ मन का भोजन होते है। वहीं दूसरी तरफ किशोरों व युवाओं में बढ़ती लव- फ्रेंड या पार्टनर बनाने का चलन आए दिन लव-ब्रोकेन सिंड्रोम के रूप में देखने को मिल रहा है। इतना ही नही,सोशल मीडिया पर छाये तमाम दोस्ती के प्लेटफॉर्म से लेकर डेटिंग आदि की रोमांटिक दोस्ती का मनोसामाजिक कहर बढ़ता ही जा रहा है।
साथ ही मादक-व्यसन के प्रमुख कारक के रूप में भी हमजोली-समूह दबाव या पीयर-प्रेशर का अहम रोल है। इस प्रकार दोस्ती दोधारी तलवार के समान है, जिसका विवेकपूर्ण चुनाव करना चाहिये। यह विश्लेषण जिला चिकित्सालय के मनोविश्लेषक डा. आलोक मनदर्शन ने अगस्त के प्रथम रविवार को मनाये जाने वाले इन्टरनेशनल फ्रेंडशिप-डे पर किया ।