फैज़ाबाद के पर्यावरणविद व लेखक डॉ.राजकिशोर सारस्वत अलंकरण से सम्मानित

  • साहित्य धर्म, राजनय और लोकसेवा के रचनात्मक समन्वय का साक्षी बना उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का निराला सभागार

  • सारस्वत सम्मान से सम्मानित हुईं कला, साहित्य व  संस्कृतिक जगत की विभूतियां

लखनऊ। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का निराला सभागार साहित्य धर्म, राजनय और लोकसेवा के रचनात्मक समन्वय का साक्षी बना। मौका था पुस्तकों के लोकार्पण के साथ कला, साहित्य, और संस्कृतिकजगत की विभूतियों के सारस्वत सम्मान का। इस आयोजन के मुख्य अभ्यागत के रूप में विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने लोकार्पित पुस्तकों की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए साहित्य, संस्कृति और राजनीति के सरोकारों पर विशद चर्चा की। इस अवसर पर उन्होंने फैज़ाबाद के पर्यावरणविद और लेखक डॉ.राजकिशोर को को सारस्वत अलंकरण प्रदान कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के मुख्य समागत के रूप में प्रख्यात साहित्यकार प्रो. ओमप्रकाश पाण्डेय और प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने साहित्य के मर्म और रचनाधर्म पर अपने सारगर्भित उद्बोधन से विषयगत् चर्चा को नए आयाम प्रदान किये।
         आशीष सेवा यज्ञ न्यास, 51 शक्तिपीठ तीर्थ के साहित्य प्रकोष्ठ के तत्त्वावधान में आयोजित इस सारस्वत कार्यक्रम में शाक्त साहित्य के विलक्षण रचनाधर्मी एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सुरेशकुमार सिंह की दो नव्यतम पुस्तकों ‘राजनीति में संस्कृति के राजदूत’, ‘देव्युपनिषद चिन्तनानुचिन्तन‘ तथा श्री सिंह द्वारा सम्पादित ‘सर्वांग शक्तिपथ’ पत्रिका के श्रीविद्या विशेषांक का लोकार्पण उत्तर प्रदेश विधानसभाध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने किया। इस अवसर पर साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में दीर्घकालिक योगदान के लिए नौ साधकों में लखनऊ के रचनाधर्मी शिशिरकुमार सिंह, सतीशचन्द्र शुक्ल ‘भावुक’ पिेयेश दीक्षित, शोभित द्विवेदी, श्रीमती कुसुम वर्मा, श्रीमती लता उपाध्याय, गुड्डू प्रसाद, एटा के शिक्षाविद् और साहित्यकार डाॅ. रमेश चन्द्र सक्सेना तथा फैजाबाद के पर्यावरणविद् और लेखक डाॅ. राजकिशोर को मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष श्री दीक्षित ने प्रशस्ति-पत्र, प्रतीक चिन्ह, उत्तरीय व तुलसी माला प्रदान कर सम्मानित किया।
      अपने उद्बोधन में मुख्य अभ्यागत विधानसभा अध्यक्ष श्री दीक्षित ने सरकारी कार्यालयों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कहा कभी किसी सरकारी महकमे में कोई चिट्ठी भेजिए। इसके बाद वह जिस प्रकार से टेबुल प्रति टेबुल आगे बढ़ती है। उसकी वह यात्रा देखना रोचक होता है। कागज के हाशिए वाले हिस्से पर एक नई तरह का साहित्य देखने को मिलता है जिसे सरकारी अफसर या कर्मचारी ही समझ सकते हैं।उन्होंने प्रशासनिक  हलके के काम के तरीकों  पर चुटकी लेते हुए कहा कि हाशिए पर लिखे, ‘‘आख्या‘‘, ‘‘प्र.स.‘‘, ‘‘अनु. अधि.‘‘, ‘‘वि.स.‘‘ जैसे शब्दों का अर्थ समझ पाना आम आदमी के बस के बाहर है, लेकिन सकारात्मक पहलू देखा जाए तो वह ये है कि यहां एक नई तरह का साहित्य भी देखने को मिलता है।  कार्यक्रम के विचार सत्र की शुरूआत आशीष सेवायज्ञ न्यास के प्रधान न्यासी और इक्यावन शक्तिपीठ के संस्थापक पं. रघुराज दीक्षित ’मंजु’ के स्वागत उद्बोधन से हुई। विशिष्ट समागत के रूप में राष्ट्रधर्म  पत्रिका के सम्पादक और देवभाषा संस्कृत के अग्रणी विद्वान प्रो. ओमप्रकाश पाण्डेय और  प्रख्यात साहित्यकार और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने धर्म, संस्कृति और अध्यात्म आधारित साहित्य के सृजन पर प्रकाश डालते हुए शक्ति साहित्य के विभिन्न आयामों पर चर्चा की।
     डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के पूर्व उद्यान अधीक्षक और विद्वान लेखक डॉ. राजकिशोर के साहित्य, पर्यावरण और औद्यानिकी सम्बन्धी रचनात्मक कार्यों की उपलब्धियाँ फैजाबाद के गौरव का विषय हैं। वे हिन्दी विज्ञान साहित्य परिषद, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई द्वारा आयोजित राष्ट्रीय हिन्दी विज्ञान लेखन प्रतियोगिता में छह बार पुरस्कृत हो चुके हैं। राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में 19 से भी अधिक शोधपत्र तथा प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 125 से भी अधिक विशेषज्ञतापूर्ण लेख प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. किशोर जनपद फैजाबाद में लगभग 25000 पौधों का रोपण करके पर्यावरण संरक्षण के लिए 2008 में वन विभाग द्वारा भी पुरस्कृत हो चुके हैं।
     बॉटनी में पी-एच.डी. उपाधिधारक डॉ. राजकिशोर अनेक पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभकार के रूप में भी अपनी सेवाएँ दी है। उनके अनेक कार्यों का प्रसारण दूरदर्शन और अन्य न्यूज चैनल्स पर हुआ है। विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के शोध परियोजनाओं में भी उन्होंने सक्रिय रूप से योगदान दिया है। लेखन को अपनी अभिरुचि को देखते हुए उन्होंने जनसंचार एवं पत्रकारिता में भी स्नातक उपाधि हासिल की है। वे अनवरत विज्ञान, पर्यावरण, कृषि-औद्यानिकी, धर्म और अध्यात्म विषयों में अपने लेखन के जरिए अपनी रचनाधर्मिता को नए आयाम दे रहे हैं। ऐसी ही तमाम उपलब्धियों के लिए डॉ. राजकिशोर को राजधानी लखनऊ में सम्मानित किए जाने पर क्षेत्रवासियों ने उन्हें बधाई देते हुए हर्ष व्यक्त किया है।
      कार्यक्रम की शुरूआत  प्रख्यात लोक गायिका कुसुम वर्मा के निर्देशन में वाणी वन्दना, वन्दे मातरम् और स्वागत गान के सस्वर गायन से हुई। श्रीमती वर्मा ने कजरी गीत, ‘‘घिर घिर बन मां छाई बदरिया..’ और बरखा गीत ‘‘रिमझिम रिमझिम पनिया रे छम छम छमके बुंदनिया रे..’ भी सुनाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस सारस्वत कार्यक्रम का सफल और सुरुचिपूर्ण संचालन प्रख्यात साहित्यकार डाॅ. जितेन्द्रकुमार सिंह ’संजय’ ने किया। अपने संचालन क्रम में डाॅ. संजय ने कहा कि इस कार्यक्रम के माध्यम से साहित्य और संस्कृति की लोकहिताय सृजनशीलता को विस्तार मिलेगा। आई.ए.एस. अधिकारी और साहित्यकार श्री सिंह ने कार्यक्रम संचालक डाॅ. संजय को प्रशस्ति पत्र प्रतीक चिह्न व उत्तरीय प्रदान कर सम्मानित किया। संचालन सहयोग प्रतिभा शाही ने किया।
      कार्यक्रम में इक्यावन शक्तिपीठ तीर्थ की सहसंस्थापक श्रीमती पुष्पा दीक्षित, न्यासी वरद तिवारी, तृप्ति तिवारी, साहित्यकार शिवमंगल सिंह ’मंगल’, लायकराम ‘मानव’, पवनपुत्र बादल, राम नरेश उज्ज्वल, अनुपम कुमार शुक्ल, कैलाश उपाध्याय, रविशंकर पाण्डेय, मुनीष भारद्वाज, विपिन अग्रवाल, आर.के.श्रीवास्तव, सुनील बाजपेई सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, बुद्धिजीवी और रसज्ञ श्रोता उपस्थित रहे।
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