स्वास्थ्य सेवाओं में समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता

विशेष : विश्व स्वास्थ्य दिवस (07 अप्रैल)
आज से 70 वर्ष पहले जेनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना, विश्व मानव को स्वास्थ्य के उच्चतम संभव स्तर के अधिकार और उसकी अनुभूति हो इसी संकल्पित उद्देश्य के साथ हुई थी।तब से यह स्वास्थ्य के भिन्न आयामों पर अध्ययन कर तमाम देशों की सरकारों को स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की सलाह देता है , जिसका उद्देश्य यह भी है कि नागरिकों को किसी वित्तीय कठिनाई का सामना किये बिना गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकें।स्वास्थ्य का समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए इस वर्ष 2018 में “यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज” की थीम का चयन किया गया है।
वस्तुतः स्वस्थ मानव किसी भी देश की पूंजी हैं, यदि सरकारें यह सत्य स्वीकार कर अपने नागरिकों को उच्चतम सम्भव स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा पाती हैं तो निश्चित ही उस देश के युवाओं की शारीरिक ,मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक, कार्यक्षमता में होने वाले गुणात्मक सुधारों से जीवन की बढ़ी प्रत्याशा उन्हें उत्साही, कुशल कर्मठ बनाने में उपयोगी होगी, जिसके सापेक्ष बीमारियों की संभावना में कमी, जीवनस्तर में सुधार, गरीबी में कमी, कुपोषण, भूख व इससे मृत्यु दर में कमी, से राष्ट्र की कुल उत्पादकता में बृद्धि होगी,वहाँ लैंगिक समानता होगी और आर्थिक विकास को गति प्राप्त होगी, और तभी कोई गरीबी या मौत अथवा दवा या भोजन में से किसी एक को चुनने को बाध्य नही होगा।
वैदिक काल से विश्वगुरु रहे भारत को कालांतर में हजारों वर्षों तक विदेशी आक्रमणकारियों की परतन्त्रता झेलनी पड़ी जिसका सबसे बड़ा नुकसान यही हुआ कि भारतीय जीवन पद्धति की संस्कृति में विकार आता गया। गुलामी के बाद फिर से खड़े हो रहे भारत मे बहुसंख्यक आबादी गांवो मे , और जीवन की मानक स्तर की सुविधाओं से दूर निवास करती है। माताएं बच्चे कुपोषित हैं, ऐसे में सभी को जनसंख्या के अनुरूप ढांचागत स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा पाना बड़ी चुनौती है, संभवतः वर्तमान भारत सरकार की आयुष्यमान योजना इसी लक्ष्य पर केंद्रित योजना हो , जिससे प्रतिवर्ष मंहगे इलाज के कारण कितने ही लोग गरीबी की रेखा से नीचे या दुनिया से चले जाते हैं। इस प्रकार यह योजना यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के उद्देश्य से जुड़ती है, किन्तु यह केवल एक पक्ष है, भारत मे स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के अन्य बिंदु भी हैं जिनपर विचार बाद में करेंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि विश्व की आधी आबादी अब तक आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राप्त कर पाने में असमर्थ है । एक सामान्य व्यक्ति अपनी आमदनी का दसवां हिस्सा अपने इलाज पर ही खर्च करता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के उद्देश्य “यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज ” से किसी भी देश के जुड़ने का अर्थ यह बिल्कुल नही समझना चाहिए कि नागरिकों को सभी स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं पूर्णतः निःशुल्क हों, अपितु व्यक्ति को न्यूनतम व्यय पर श्रेष्ठतम स्वास्थ्य सेवाएं सहजता से उपलबद्ध कराना है।उपचार के साथ स्वस्थ जीवन शैली अपनाने व रोगों से बचाव के प्रति वार्ता, संगोष्ठी, प्रचार, व मीडिया के भिन्न माध्यमो से जुड़कर शिक्षित व जागरूक कर भी इस उद्देश्य से जुड़ा जा सकता है।
निश्चित रूप से यह सेवा कार्य है जो निरन्तर प्रेरणा, प्रोत्साहन व उचित परामर्श से ही उद्देश्यपूर्ण हो सकता है ।इसके सम्पादन, संचालन में सरकारी, गैर सरकारी, स्वयंसेवी संगठन , व्यक्तिगत, सामूहिक सभी स्तरों पर सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है।वैश्विक व स्थानीय स्तरों पर जागरूकता के भिन्न आयोजनों के माध्यम से व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित किया जाए, इस दिशा में सहयोगी प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाय और जरूरत मंदों को समयानुरूप उचित परामर्श मिलना चाहिए।
सरकार की इच्छाशक्ति इस लक्ष्य को हासिल करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्वस्थ्यनीति के निर्धारण से पूर्व जनमत सर्वेक्षण कर समस्या के मूलकारण पर व उसके निदान हेतु सभी सम्भव उपायों व उनके क्रियान्वयन पर विचार होना चाहिए।उपचार, बचाव, उपलब्धता व परिणामो के आधार पर सरल, सहज ,कम संसाधन व खर्च वाले चिकित्सीय सेवाओं को समर्थन दिया जाना चाहिए। सरकार के साथ नागरिकों को भी व्यक्तिगत, सामूहिक, समाजिक, सांगठनिक, राजनैतिक, प्रतिनिधित्व करते हुए सक्षम राजनैतिक, सरकारी , प्रशासनिक पटल पर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए। वर्तमान समय मे सोसल मीडिया जानकारी बढ़ाने का सशक्त माध्यम है किंतु प्रमाणिकता पर अवश्य ध्यान देना होगा। प्रत्येक स्तर पर स्वस्थ संवाद को बढ़ावा देना चाहिए। मीडिया की भूमिका इस विषय पर जितनी सकारात्मक, सहयोगी होगी जागरूकता का यह लक्ष्य उतना ही सरल होगा, क्योंकि मीडिया सरकार व जनता के बीच संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है।
हमारे देश की स्वस्थ्यनीति में क्या जरूरी है।
भारत मे सरकार द्वारा चिकित्सा की चार प्रमुख पद्धतियां मान्यताप्राप्त हैं,फिर भी आबादी के अनुपात में मानक के अनुरूप योग्य चिकित्सकों की कमी है, ग्रामीण व सुदूर शहरी क्षेत्रों में यह स्थिति तो और भी बदतर है।इसके दो प्रमुख कारण है पहला तो एलोपैथिक चिकित्सक बेहतर सुविधाएं न होने के कारण गांवो में सेवा देने जाना नही चाहते, दूसरा सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति व राजनैतिक उपेक्षा । क्योंकि यह सरल से बात है कि समस्या ज्ञात होने पर सभी सम्भव उपायों से निदान के प्रयास होने चाहिए।
स्वास्थ्य सेवा के लिए सभी मान्यताप्राप्त पद्धतियों के प्रशिक्षित चिकित्सकों की सेवा आवश्यक कर दी जानी चाहिए। इसके लिए शिक्षण संस्थानों की व्यवस्था चुस्त दुरुस्त होनी चाहिए । वर्तमान सरकार ने इस दिशा में कई संशोधन करने का संकेत अवश्य किया किन्तु व्यवहारिक सत्य के आधार पर सुधार की आवश्यकता है। होम्योपैथी, आयुर्वेद व अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में समग्र स्वास्थ्य की रक्षा का उद्देश्य यूएचसी के सहज निकट प्रतीत होता है।
सरकार को चाहिए स्वास्थ्य केंद्रों को “कैफेटेरिया एप्रोच” अपनाते हुए “पॉलीपैथी हब ” के रूप में विकसित करना चाहिए जिपर चारों पैथी के चिकित्सक के अलग अलग ड्यूटी आवर्स (ओपीडी 2 घण्टे+6घण्टे सेवा) तय कर 24 घण्टे चिकित्सक की उपब्धता कराई जा सकती है।
अथवा न्यूनतम 5 हजार की आबादी पर एक “निजी चिकित्सक -सरकारी सहयोग” पर अनुबन्ध आधारित सेवा की शुरुआत की जा सकती है जिसमे चिकित्सक की क्लिनिक में ओपीडी समय की सेवाएं सरकारी पर्चे पर दिए जाने के लिए सरकार चिकित्सकों को न्यूनतम किराए या मूल्य पर सरकारी भवन, दुकान, जमीन का सहयोग कर सेवा के बदले सम्मानजनक मानदेय या वेतन निर्धारित कर सकती है। जिससे अव्यक्त रूप से संविदा का भ्रष्टाचार मिट सकेगा, जनता को उसकी पहुच में स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी, तो निश्चित रूप से सरकार को यश प्राप्त होगा।
डॉ उपेन्द्र मणि त्रिपाठी
राष्ट्रीय महासचिव
होम्योपैथी चिकित्सा विकास महासंघ
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