होम्योपैथी विषाणुजनित रोगों में सर्वाधिक सफल चिकित्सापद्धति : डॉ. उपेन्द्र मणि त्रिपाठी

  • व्यक्ति की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को सुरक्षित करती है होम्योपैथी

  • संचारी रोग और उनसे बचाव

डॉ. उपेन्द्र मणि त्रिपाठी
डॉ. उपेन्द्र मणि त्रिपाठी
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फैजाबाद। जीवन मे स्वस्थ रहना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्द्धि है। व्यक्ति का प्रकृति से अटूट सम्बन्ध है इसलिए वह इसमें होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित होता है। भारत मे प्रकृति पूर्ण रूप में विद्यमान है इसलिए यहां सभी छः ऋतुएं समयावधि के साथ बदलती रहती हैं, किन्तु कोई भी परिवर्तन अचानक पूरा नही होता उसमे कुछ समय लगता है, यह समय ऋतुओं का संक्रमण काल कहलाता है और इस प्रकृति के संक्रमण काल का असर मनुष्य की शारीरिक क्रियाविधियों पर भी पड़ता है, तदनुरूप ही शरीर स्वयं को ढाल लेता है, सामान्यतः यह शरीर की सुरक्षात्मक प्रणाली का हिस्सा है ।यूँ भी कह सकते हैं कि परावर्तन के इस संक्षिप्त काल मे सुरक्षा का आवरण प्रकृति और व्यक्ति सभी मे कम हो सकता है, तो स्वाभाविक है कि इसका लाभ उठाने वाले कारकों जो इसी प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी का इंतजार कर रहे होते है , उनका आक्रमण और प्रभाव दोनो ही आपेक्षिक रूप से तेज हो सकते हैं, जिनसे बचने का पहले ही उपाय कर लिया जाय तो आक्रमण भले न रोका जा सके किन्तु प्रभाव निष्क्रिय या कम अवश्य किया जा सकता है।

क्या है संचारी रोग

सामान्यतः संचारी रोग को संक्रामक रोग भी कहते है, जो किसी ना किसी रोगकारको (रोगाणुओं) जैसे प्रोटोज़ोआ, कवक, जीवाणु, वाइरस इत्यादि के कारण होते हैं और एक शरीर से अन्य शरीर में फैलने की क्षमता होती है। मलेरिया, टायफायड, चेचक, इन्फ्लुएन्जा इत्यादि संक्रामक रोगों के उदाहरण हैं।

हम कब आते हैं संचारी रोगों की चपेट में

होम्योपैथी रोगोत्तपत्ति कारण के दर्शन और विज्ञान की दृष्टि से शरीर की जीवनीशक्ति वातावरण के अनुरूप स्वयं का साम्य स्थापित कर रही होती है इसलिए हमारे अंदर की मयस्मैटिक अवस्था सोरा साइकोसिस या सिफिलिस भी उनके साम्य के साथ विचलन की स्थिति में होती हैं इसी बीच जीवनी शक्ति की न्यूनता के कारण प्रकृति से समगुणी रोगकारकों जिन्हें पर्याप्त प्रतिरक्षा का सामना नही करना पड़ता प्रविष्ट होने का अवसर पा जाते है और स्वभावनुरूप अंगतन्त्र की क्रिया को प्रभावित कर सकने में सफल हो जाते हैं। यह किसी एक मयज्म के कारण भी संभव है अथवा संयुक्तरूप से एकाधिक मायज्म भी हो सकते हैं। विशेष बात यह भी है इस समयांतराल में इनकी सक्रियता इतनी हो चुकी होती है कि यह चीजों को दूषित कर उन्ही को अपने संवहन का माध्यम बनाकर फैल सकने में सफल हो जाते हैं।

क्या है संक्रमण

हम कह सकते हैं कि वे रोग जो किसी व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ,या उसके किसी भी स्वरूप आदि के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सम्पर्क से एक से दूसरे व्यक्ति में पनप सकते हैं तो वह संक्रामक रोग अथवा छुआछूत का रोग कहलायेंगे, और यही क्रिया संक्रमण या इंफेक्शन  कहलाती है। इनके फैलने में जो भी सहायक माध्यम चुना जाता है व्यक्ति, पशु, कीट, खाद्य, पेय वह रोग संवाहक कहलाता है। क्योंकि इनके फैलने की संभवनाएं तेज होती हैं इसलिए यदि समय पर रोकथाम के उचित उपाय न किये जायें या इलाज में लापरवाही की गयी तो कम ही समय मे यह महामारी के रूप में सामने आ सकते है या पूरे क्षेत्र अथवा प्रान्त में फैल सकते है।

कौन है संक्रामक ;रोगजनक 

मॉडर्न चिकित्सा पद्धति में इसके कारण जीवाणु, विषाणु, कवक, या परजीवी माने जाते हैं, किन्तु होम्योपैथी इन्हें जीवनीशक्ति की न्यूनता के कारण शरीर मे उत्प्न्न अवसर पर उपज का परिणाम मानती है जो बाद में अपनी विषाक्तता या रोगउत्पादन की विशिष्टता के अनुरूप रोग का विकास करते हैं। हैनिमैन ने इन्हें ही 18वीं शताब्दी में मायज्म कहा था जिसे 19 वीं शताब्दी में वैज्ञानिक लुई पॉश्चर ने माइक्रोस्कोप के विकास के बाद जीवाणु के रूप में खोज की। बाद में भिन्न रोगों में उनकी पहचान कर वर्गीकरण किया गया।जैसे टीबी, दमा, कालरा, टायफायड,टिटनस, प्लेग, पेचिश, आदि और तत्सम उनके प्रतिजैविक दवाईयो (एंटीबायोटिक्स) की खोज की गई। चिकित्सा जगत में एंटीबायोटिक्स की खोज एक क्रांतिकारी हथियार माना जाने लगा, किन्तु तब से लेकर अब तक इसमें बहुत से परिवर्तन आते रहे है। यह भी ज्ञात हुआ कि मनुष्य सदैव इनसे घिरा रहता है जिससे उसका सुरक्षातंत्र लगातार संघर्ष शील रहता है। सामान्यतः सक्रमण करने वाले एक प्रकार के जीवाणु एक विशिष्ट रोग लक्षण उत्पन्न करते हैं किंतु कभी कभी यह एकाधिक समूहों में संयुक्त रोग भी पैदा कर देते हैं, जो उपचार की दृष्टि से भी जटिल मने जाते हैं। जीवाणुओं को जीवित रोगकरकों की श्रेणी में रखा गया है,और आर्द्र या नमी वाला मौसम अथवा शरीर मे पसीना आदि इनके पनपने के लिए सर्वाधिक अनुकूल रहता है।पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, मूत्र संक्रमण, त्वचा, हृदयरोगों, अंगों जोड़ो के आवरण, आदि में इनसे होने वाले बहुतायत रोग हैं।  दूसरा सर्वाधिक संक्रमण कारक है विषाणु जो यूँ होते तो निर्जीव हैं किंतु किसी शरीर मे यह तेजी से सक्रिय हो जाते हैं।सामान्यतः यह भी इसी संक्रमण काल मे सक्रियता प्राप्त कर पाते हैं। जैसे अभी होली निकट है और सर्दी से गर्मी की तरफ प्रकृति बदल रही है, जल अन्न दूषित हो सकते है और विषाणुओं या वायरस के कारण चिकनपॉक्स, मीजल्स, एन्फ्लूएंजा, डेंगू, चिकनगुनिया, मम्प्स,हरपीज, आदि रोग हो सकते हैं।खुश्क मौसम इनके लिए सर्वधिक अनुकूल रहता है।इसके बाद जिस संक्रमण से अधिकाधिक आबादी परेशान होती है वह है कवक या फंगस, यह भी अधिक नमी के कारण अथवा खुश्की में भी पनपटे हैं।पुरुषों महिलाओं में जननांगों के आसपास दाद,इसका वर्तमान में सबसे परिचित प्रभाव है। इसीप्रकार परजीवियों से भी रोग जैसे मलेरिया, अतिसार, स्कैबीज, खुजली आदि हो सकते हैं।

कैसे  और किनसे फैलते है रोग-

प्रदूषित जल, वायु, पराग, फूल पर जीवो के सम्पर्क से कुत्ते, बिल्ली, पालतू पशु, सियार,सुअर, चूहे, बन्दर, आदि के काटने, अथव हमारे खांसने, छींकने, थूकने, खुले में मल मूत्र त्याग करने, आदि से ड्रॉपलेट संक्रमण, या रोगी व्यक्ति से सम्पर्क, संक्रमित वस्तु खाद्य, पेय, यंत्र, ,घरेलू मक्खी, मच्छर, जूं, भुनगे, किलनी,आदि के काटने से रोग एक से दोसरे में फैल सकता है।

क्या है रोगोद्भवन काल

व्यक्ति में संक्रमण प्रवेश करने के बाद रोग लक्षणों के उत्पन्न होने में लगने वाला समय ही रोगोद्भवन काल( incubation period)कहलाता है।

कैसे पहचानें जीवाणु या विषाणु संक्रमण –

यूँ तो प्रत्येक संक्रमण के अपने विशिष्ट लक्षण होते हैं जिनकी पुष्टि प्रयोगशाला जांच में होती है। किंतु सामान्यतः जीवाणुओं के संक्रमण में कोई अंग विशेष ही दर्द , सूजन, लालिमा, बुखार, आदि के लक्षण देगा, जबकि विषाणुजनित रोगों में पूरे शरीर मे थकान, बुखार आदि लक्षण पाए जाते हैं।

क्या हैं बचाव के उपाय-

बचाव की दृष्टि से प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने के लिए आहार, विहार, व्यवहार, संयमन, दिनचर्या नियमित, स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें , ताजा भोजन करें, शुद्ध, जल, पौष्टिक सन्तुलित आहार लें।
घर के अंदर व बाहर सफाई रखें, हाथ धुलकर ही भोजन करें, कपड़े साफ पहने, सूखे मेवे जैसे अंजीर, अखरोट, बादाम, काजू का प्रयोग करें, तुलसी के 10 -12   पत्ते नियमित ले सकते हैं।
अपने हाथों से अपनी आंखें, नाक या मुंह न छुएं।
नियमित रूप से बाल कटवाएं और धोएं, शेविंग कराएं, और बढ़े हुए नाखूनों को काटें।
टीकाकरण बहुत सी बीमारियों के होने की संभावनाओं को कम कर सकता है।
यदि आपको उल्टी हो रही है, दस्त बना हुआ है या बुखार है, तो घर से बाहर न निकलें।
शारीरिक संबंध बनाते समय हमेशा सुरक्षा बरतें और कंडोम का उपयोग करें।
अपना खुद का टूथब्रश, कंघी और रेजर का उपयोग करें। पानी पीने के ग्लास और भोजन के बर्तनों को साझा न करें।

उपचार-

होम्योपैथी विषाणुजनित रोगों में सर्वाधिक सफल चिकित्सापद्धति है। यद्यपि औषधि का सेवन कुशल प्रशिक्षित चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए क्योंकि यहाँ औषधि का चयन रोग आधारित नही व्यक्ति आधारित है, इसलिए कहीं पढ़कर जानकारी तो प्राप्त की जा सकती है निदान की निपुणता नहीं। होम्योपैथी में संक्रमण से बचाव उपचार के लिए आर्सेनिक, जेसिमियम, ब्रायोनिया, वैरियोलिनम , युपेटोरियम, टेरेबिन्थ, कैंथेरिस, कैलेंडुला, एचनेशिय, बेल, मर्कसाल आदि दवाएं हैं जिनका प्रयोग रोगी को निश्चित स्वास्थ्य लाभ देता है।
डॉ. उपेन्द्र मणि त्रिपाठी
द प्रतिष्ठा होम्योपैथी
कृष्ण विहार कालोनी फैज़ाबाद
महासचिव – होम्योपैथी चिकित्सा विकास महासंघ
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