आस्था है स्वस्थ मनोयुक्ति पर अंधविश्वास बन सकती है रुग्णता : डॉ मनदर्शन

👉आस्था व अंधविश्वास में है सूक्ष्म मनोविभेद 

राष्ट्रीय युवा दिवस की पूर्व संध्या पर हुई “आस्था व युवा मनोस्वास्थ्य“ विषयक कार्यशाला

अयोध्या । जिला चिकित्सालय के युवा व किशोर मनोपरामर्शदाता डॉ आलोक मनदर्शन ने “आस्था व युवा मनोस्वास्थ्य” विषयक कार्यशाला में आस्था के मनोजैविक पहलू का विश्लेषण करते हुए बताया  कि आस्था वह मनोदशा है जिससे  मस्तिष्क में एंडोर्फिन व आक्सीटोसिन नामक रसायनों का स्त्राव बढ़ जाता है तथा तनाव बढ़ाने वाला मनोरसायन कार्टिसोल काफी कम होने लगता है जिससे हमारे मन में स्फूर्ति, उमंग, उत्साह व आत्मविश्वास का संचार होता ही है, साथ ही सम्यक मनोअंतर्दृष्टि का भी विकास होता है

♦आस्था व अंधविश्वास का मनोभेद : 

स्वस्थ व परिपक्व मनोरक्षा-युक्ति सम्यक आस्था व आध्यात्मिकता की तरफ ले जाता है जिससे मनोअंतर्दृष्टि का विकास होता है और मानसिक शांति व स्वास्थ्य में अभिवृद्धि होती है। जबकि अंधविश्वास से अपरिपक्व, न्यूरोटिक, साईकोटिक , रुग्ण व विकृत  मनोरक्षा-युक्तिया  प्रबल होती हैं जो कि  मनोअंतर्दृष्टि को क्षीण करते हुए डिसोसिएटिव डिसऑर्डर, कन्वर्जन डिसऑर्डर,फ़ोबिया,अवसाद, ओ.सी.डी.,उन्माद , अवसाद , ट्रान्सपजेशन व स्किजोफ्रिनिया जैसी गंभीर मनोरोग का कारण बन सकती है।

♦सलाह :

डॉ मनदर्शन ने अपील की है कि समय समय पर पूरी दुनिया में अंधभक्ति या अंधविश्वास जनित घटनाये प्रकाश में आती रहती जो पूरी मानवता को झकझोर कर रख देती है, पर हम उससे सीख या सबक की जागरूकता को समाज मे बहुत जल्द ही धूमिल होते देने देते है और वैज्ञानिक आस्था के पहलू पर गहराई में जानें की आवश्यकता को नज़रअंदाज़ कर जाते है। युवा वर्ग को मनोजागरुकता के लिये आगे आना होगा जिससे ऐसी वीभत्स घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके और हम एक मनोस्वस्थ समाज की स्थापना में योगदान कर सके इसके लिये मीडिया जनित जागरूकता पे विशेष जोर दिया । हाल ही में घटी बुरारी घटना अंधभक्ति का चीखता उदाहरण है। कार्यशाला में बाल किशन, अरशद व अनित दास आदि मौजूद रहे ।

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