बच्चों की तरह निर्मल मन में ही होती है राम की प्रतिष्ठा : संत रामदिनेशाचार्य

by Next Khabar Team
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-श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा आयोजित द्वितीय प्रतिष्ठा द्वादशी पर हो रही कथा


अयोध्या। बालक राम सहज हैं, सुलभ हैं, राम कथा को वसुंधरा पर लाने का श्रेय महादेव को जाता है। कागभुसुंडि जैसे ज्ञानी ने बालक राम का जब दर्शन किया तो वह 5 वर्ष तक अयोध्या में ही विराजमान रहे। वह राम बालक के रूप में जो थे उनका वंदन करते रहे। जिसका हृदय बालक की तरह नहीं होगा उसके मन में राम की प्रतिष्ठा नहीं हो सकतीद्य भगवान हमेशा मन मांगते हैं। क्योंकि इसी मन में दम्भ, द्वेष, दुराशा होती है। भगवान निर्मल मन की कामना रखते हैं, निर्मल मन बच्चे का होता है।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र द्वारा आयोजित द्वितीय प्रतिष्ठा द्वादशी अवसर पर अंगद टीला मैदान के मंच पर दूसरे दिन की कथा में व्यास जगद्गुरु रामानुजाचार्य संत रामदिनेशाचार्य ने कहा कि राम मंदिर निर्माण से सादियों के अंतराल के बाद अयोध्यावासियों को प्राण की प्राप्ति हुई, अयोध्या जीवंत हो उठी। आज पूरा विश्व राम के विषय में जानने को उत्सुक है। एक उदाहरण के माध्यम से भारद्वाज मुनि की चर्चा करते हुए कहा कि ब्रह्म में क्रोध नहीं होता, विरह नहीं होता, दशरथ नंदन राम यदि ब्रह्म हैं तो कैसे?

उनमें ब्रह्म के लक्षण क्यों नहीं श्रीराम कथा जीव के इस तरह के भ्रम को मिटाने वाली हैद्य जीवन के हर अज्ञान, अंधकार को नाश करने में केवल राम कथा ही समर्थवान है। संत श्री ने कहा भक्तों के हृदय में भगवान की कथा सुनने की इच्छा होनी चाहिए इसके लिए अपने इष्ट के प्रति प्रेम होना चाहिए। कथावाचक महत्वपूर्ण नहीं होता, कथा का श्रोता महत्वपूर्ण होता है जो भगवान राम की कथा सुनता है। भक्ति में प्रतिष्ठा की चिंता नहीं होती और जहां प्रतिष्ठा की चिंता हो वहां भक्ति नहीं होती।

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कलयुग में इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण मीरा हैं। जिसको पूजा और भक्ति का अभिमान हुआ माया ने उसकी भक्ति चूर कर दी। इसके साथ ही संत प्रवर ने “माया तेरी बहुत कठिन है राह“ भजन गया तो श्रोता भावविभोर हो उठे। श्रीराम कथा के दूसरे दिन व्यास पीठ पर जगद्गुरु संत रामदिनेशाचार्य के आसीन होने पर ट्रस्टी डॉ अनिल मिश्र, धनंजय पाठक, डॉ चंद्रगोपाल पाण्डेय आदि ने पूजन कियाद्य इस अवसर पर रामायणी राम शरण, नरेश गर्ग, अरुण गोयल आदि मौजूद रहे।

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