-मरीज का शक व अज्ञान-स्वजन हैं इलाज में बाधक, शक का इलाज है मनोचिकित्सा के पास

अयोध्या। शक एक ऐसा मर्ज है जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास तो नहीं था, पर मनोचिकित्सा से इसका सटीक उपचार होता है। इस रोग का अल्प व मध्यम रूप पैरानोइड पर्सनालिटी डिसऑर्डर-पीपीडी तथा विराट-रूप पैरानोइड सीज़ोफ्रेनिआ कहलाता है। देश में ऐसे मरीज सवा करोड़ से भी अधिक हैं जो अधिकांशतः बीस से पैंतालिस उम्रवर्ग के हैं।
लक्षण:
ऐसे मरीज को लग सकता है कि उसके दिमाग़ को कोई दूसरा पढ़ रहा या नियंत्रित कर रहा या दिमाग़ में तरंगे भेज रहा है। किसी सेलीब्रिटी से रोमांटिक सम्बन्ध या सुपरपावर वाला व्यक्ति होने या दूसरों का मन पढ़ लेने, सहकर्मियो या अन्य द्वारा षड्यंत्र किए जाने,जहर देने या हमला करने जैसी आशंकाए दिख सकती हैं। लव-पार्टनर या विवाहित साथी से बेवफाई का शक सुसाइड या होमीसाइड भी करा सकता है। मरीज को अवास्तविक दृश्य, आवाज़, गंध, स्वाद व स्पर्श भी अनुभव हो सकते हैं।
उपचार:
शक्की मरीज के उपचार में परिजनों की जागरूता पहली शर्त है ,क्योंकि रोगी अपने को बीमार नहीं मानता और न ही दवा खाने को तैयार होता है, बल्कि उसे डॉक्टर,दवा व परिजनों पर इलाज के नाम पर जानलेवा साजिश का शक होता है। ऐसा मरीज आत्मरक्षा में घर छोड़ भाग भी सकता है। रही-सही कसर पूरी कर देता है परिजनों का मरीज के प्रति दंडात्मक प्रतिक्रिया व अंधविश्वास जन्य क्रिया कलाप।
परिजन सतर्कता, संवेदनशीलता,परोक्ष-औषधि चिकित्सा, बोध- व्यवहारिक चिकित्सा से रोगी में स्वस्थ अंतर्दृष्टि का विकास व मनोपुनर्वास होता है। यश स्किल्स में आयोजित मनोजागरूकता कार्यशाला में जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डा आलोक मनदर्शन ने यह जानकारी दी। कार्यशाला सत्र में पैका फाउंडेशन की सलाहकार सरिता उपाध्याय, पैका स्किल्स सलाहकार संकर्षण शुक्ला व प्रशिक्षक दीपक पाण्डेय सहित सभी प्रशिक्षुओं ने प्रतिभाग किया