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शोध छात्रा ने फसलों के जैविक कीट नियंत्रण हेतु खोजे जीवाणु

-शोध के क्षेत्र में कृषि विश्वविद्यालय निरंतर प्रगति के आयाम पर

अयोध्या। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की शोध छात्रा दिव्या श्रीवास्तव ने अपने शोध प्रवेक्षक डॉ आदेश कुमार ,सहायक प्राध्यापक के दिशा निर्देशन में तीन ऐसे जीवाणुओं को खोजने में सफलता पाई है जो विभिन्न फसलों जैसे चना मटर टमाटर भिंडी बैंगन कपास आदि में लगने वाले सूड़ी की रोकथाम में सक्षम है । सूड़ी फसलों को विभिन्न अवस्थाओं में 35 से 50 प्रतिशत तक उपज को हानि पहुंचाती है। जिसके रोकथाम हेतु विभिन्न प्रकार के रासायनिक कीटनाशी दवाओं का प्रयोग हो रहा है।

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जिससे जल, वायु एवं मिट्टी का पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है , इस समस्या के निवारण हेतु जैविक तरीकों से फसलों को बचाने हेतु शोध हुए जिसमें बैसिलस थूरिनजेंसीज प्रमुख है। बैसिलस थूरिनजेंसीज के अत्याधिक एवं लगातार प्रयोग के कारण सूड़ी जैसे कीटों में इसके प्रति सहिषशुणता विकसित हो गई है। जिसके कारण आज बहुत से कीट बैसिलस थूरिनजेनसिस के प्रयोग के बाद भी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में खोजे गए नवीन जीवाणु कल्चर बैसिलेस थूरिनजेनसिस (बी0टी0) कल्चर का एक उत्तम जैविक कीटनाशी के विकल्प सिद्ध होंगे।इन तीनों जीवाणुओ को प्रदेश के विभिन्न फसलों के जड़ क्षेत्र की मृदा से प्रथक कर निकाला गया है जिनके नाम वैसिलस सफेनसिस, बैसिलस ओकेनीसेडिमिनिस तथा बैसिलस अलटीटयूडिनिस है। इन सभी जीवाणु कल्चरो को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्म जीव कल्चर संग्रह मऊ उत्तर प्रदेश में संरक्षित कर दिया गया है, जिसकी सूचना प्राप्त हो चुकी है ।

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संरक्षित जीवाणु कल्चर से तरल रूप में जैविक कीटनाशी तैयार हो सकेगा और किसान अपनी फसलों में प्रयोग कर कीटों से बचाव कर पाएंगे तथा रासायनिक कीटनाशक दवाओं की अपेक्षा मूल्य कम होने से फसल उत्पादन लागत में भी कमी आएगी। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ बिजेंद्र सिंह ने किए गए शोध कार्य तथा जीवाणु कच्चर को संरक्षित कराने के लिए डॉ आदेश कुमार तथा उनकी टीम को को बधाई दी और कहा कि जैविक कीटनाशी का उत्पादन शुरू होने पर किसान इसका प्रयोग करके लाभ उठा सकेंगे।

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