-हिन्दी पत्रकारिता और प्रेमचंद’ विषय पर एक परिचर्चा का हुआ आयोजन
अयोध्या। जनवादी लेखक संघ की फ़ैज़ाबाद इकाई द्वारा ’हिन्दी पत्रकारिता और प्रेमचंद’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन शहर के नाका स्थित आर बी टावर सभागार में किया गया। इस अवसर पर अपना वक्तव्य देते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग के प्रोफेसर और पत्रकारिता विभाग के समन्वयक प्रो राजेश मल्ल ने कहा कि जिन उद्देश्यों के साथ प्रेमचंद ने साहित्यिक पत्रकारिता का प्रारंभ किया था, उस विरासत को नए विमर्शों के माध्यम से ’हंस’ पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव ने आगे बढ़ाने का काम किया।
वे सच्चे अर्थों में प्रेमचंद की साहित्यिक परंपरा के वारिस थे। उन्होंने ’हंस’ को सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाते हुए स्त्रियों और दलितों के प्रश्न को केंद्र में रखा। प्रेमचंद को याद करते हुए उन्होंने कहा कि एक लेखक अपने सृजनात्मक लेखन और अखबारी लेखन में एकदम भिन्न-भिन्न होता है। उन्होंने कहा कि अपने समय और समाज से मुखातिब हर संवेदनशील रचनाकार अपनी वैचारिक प्रतिक्रिया को पत्रकारिता और लेखों के माध्यम से अभिव्यक्त करने का काम करता है। उन्होंने कहा कि हर समय में जन-बुद्धिजीवी जनता तक अपने विचारों के सम्प्रेषण के लिए उस समय के अनुकूल माध्यम का प्रयोग करता है, पत्रकारिता भी उनमें से एक है।
प्रेमचंद बहुत शास्त्रीय अर्थों में पत्रकार नहीं थे बल्कि एक जन-बुद्धिजीवी थे। उनके अनुसार प्रेमचंद ने ’जागरण’ के संपादकीय में पत्रकारिता को न्याय का दृढ़ता से पक्ष लेने वाला और अन्याय का दृढ़ता से विरोध करने वाला माध्यम कहा था। प्रो मल्ल ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि तमाम ऐसे रचनाकार भी हैं जो लेखन में तो प्रेमचंद की परंपरा के अनुगामी नहीं रहे लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता में उन्होंने प्रेमचंद के रास्ते का अनुसरण किया है। इस सिलसिले में उन्होंने कमला प्रसाद, मुद्राराक्षस, अखिलेश, रामजी राय और सदानंद शाही जैसे कई संपादकों का उदाहरण दिया, जिन्होंने बड़े लक्ष्यों को केंद्र में रखकर पत्रिकाएं निकालीं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ-कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद अपने लेखन, पत्रकारिता और मूल्यों के कारण आज भी प्रासंगिक हैं, आज के युवा भी उनको पढ़ना चाहते हैं। उनके अनुसार प्रेमचंद के कथा लेखन के बारे में अधिक बात होती है किन्तु उनके लेखों के बारे में बात प्रायः नहीं होती, आलोचकों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
प्रेमचंद अपने पत्रकारीय रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं, नए समय और समाज की चुनौतियों के समक्ष उनकी जरूरत और अधिक महसूस होती है। आज का अधिकांश मीडिया जिस तरह जनता की ब्रेनवाशिंग का उपकरण बन गया है और लगता है जैसे पत्रकारिता की मृत्यु हो गई हो, ऐसे में प्रेमचंद की पत्रकारिता के आदर्श को सामने रखने की जरूरत है।
वरिष्ठ पत्रकार और जनमोर्चा के पूर्व संपादक कृष्णप्रताप सिंह ने इस अवसर पर अपने वक्तव्य में कहा कि ‘हंस’ और ‘जागरण’ समेत मुंशी प्रेमचंद द्वारा सम्पादित प्रायः सारे पत्र गवाह हैं कि उनका पत्रकारीय योगदान भी कतई उपेक्षणीय या विस्मरणीय नहीं है। वे इन पत्रों में छपी टिप्पणियों, लेखों व सम्पादकीयों की मार्फत देश की तत्कालीन गोरी सत्ता को चुनौती देने और आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिहाज से भी अविस्मरणीय है और हिन्दी भाषा व पत्रकारिता के उन्नयन के लिहाज से भी ।
उन्होंने कहा कि जैसे कथाकार के रूप में वैसे ही पत्रकार व सम्पादक की भूमिकाएं निभाते हुए भी प्रेमचंद रामझरोखे बैठकर मुजरा भर नहीं लेते, ‘समाज के आगे आगे चलने और जलने वाली मशाल’ बने रहते हैं। प्रेमचंद अपनी और अपने परिवार की तमाम आर्थिक परेशानियों के बावजूद इस काम में पल भर को भी अपने पथ से विचलित नहीं हुए और जुर्माना व जमानत मांगे जाने जैसे अनेक जोखिम उठाते हुए लगातार संघर्षरत रहे। कृष्णप्रताप सिंह के अनुसार प्रेमचंद स्वतंत्रता सेनानी शब्द के आजकल प्रचलित अर्थों में भले स्वतंत्रता सेनानी नहीं बन पाये हों, लेकिन अपने उपन्यासों व कहानियों ही नहीं, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों व सम्पादकीयों के जरिये भी उन्होंने आजादी के सवाल को खासा तीखा किया और उसके लिए संघर्षरत नायकों में विद्रोह की चेतना जगाईं। इतना ही नहीं, वे जयशंकर प्रसाद व आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साथ त्रयी बनाकर पुराने मूल्यों की जगह नये मूल्यों व संस्कारों को प्रतिष्ठित करते भी दिखते हैं।
कार्यक्रम के प्रारंभ में विषय-प्रवर्तन करते हुए कवि-प्राध्यापक डॉ विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद के पत्रकारीय जीवन को तीन हिस्सों में बांटकर देखा जा सकता है, पहला हिस्सा वह है जब वे ’ज़माना’, ’आजाद’, ’चकबस्त’ आदि हिन्दी-उर्दू की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिख रहे थे; दूसरा वह जब वे दूसरों द्वारा निकाली जा रही पत्रिकाओं यथा- ’माधुरी’ और ’मर्यादा’ का सम्पादन कर रहे थे; तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जब वे नौकरी छोड़कर प्रेस खोलते हैं और ’हंस’ और ’जागरण’ नामक मासिक और साप्ताहिक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ करते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की पत्रकारिता के उद्देश्य को इस बात से समझा जा सकता है कि वे ’हंस’ के पहले अंक के संपादकीय में लिखते हैं कि, “हंस अपनी नन्हीं चोंच में चुटकी भर मिट्टी लिए हुए समुद्र पाटने, आजादी की जंग में योगदान देने निकला है।“ डॉ विशाल के अनुसार प्रेमचंद के लिए पत्रकारिता सत्ता की कटु आलोचना और जनता के हितों की रक्षा करने का माध्यम थी। यही कारण है कि ’हंस’ में प्रकाशित एक लेख पर अंग्रेजों द्वारा जुर्माना लगा दिए जाने और निरंतर घाटे में जाते रहने के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता के अपने मिशन को स्थगित नहीं किया।
डॉ विशाल ने कहा कि प्रेमचंद पत्रकारिता की भाषा को लेकर भी सजग रहते थे। प्रेमचंद ने सामाजिक न्याय के महत्व को समझते थे और यही कारण था कि पूना पैक्ट के बाद जब समूचे भारत में डॉ अंबेडकर के विरुद्ध एक व्यापक राय बन गई थी, उन्होंने प्रचलित राय के विरुद्ध जाकर डॉ अंबेडकर को ’हंस’ पत्रिका के मुखपृष्ठ पर जगह देकर एक बड़ा संदेश दिया।
वक्तव्यों के बाद प्रश्नोत्तर सत्र भी अत्यंत विचारोत्तेजक रहा। वरिष्ठ कवि और जनवादी लेखक संघ के उपाध्यक्ष डॉ नीरज सिंह ’नीर’, पत्रकार कुमकुम भाग्या, प्राध्यापिका डॉ पूनम यादव, कवयित्री पूनम सूद और बृजेश श्रीवास्तव के प्रश्नों का उत्तर वक्ताओं द्वारा दिया गया। कार्यक्रम का संचालन जनवादी लेखक संघ, फ़ैज़ाबाद के कोषाध्यक्ष और कार्यकारी सचिव मुजम्मिल फिदा द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कार्यक्रम संयोजक सत्यभान सिंह जनवादी ने प्रेमचंद के योगदान को अविस्मरणीय बताया।
कवि-लेखक राजीव श्रीवास्तव ने भी मौजूद अतिथियों और वक्ताओं का स्वागत किया। इस अवसर पर जलेस फ़ैज़ाबाद के संरक्षक एडवोकेट रामजीत यादव ’बेदार’, वरिष्ठ कवि आशाराम जागरथ, वरिष्ठ लेखक और चिंतक आर डी आनंद, कवि-प्राध्यापक डॉ प्रदीप सिंह, युवा लेखिका पूजा श्रीवास्तव, युवा कवयित्री मांडवी सिंह, अखिलेश सिंह, ओमप्रकाश रोशन, अमित श्रीवास्तव, आजाद अली, पप्पू सोनकर, वाहिद अली, अजय श्रीवास्तव, महावीर पाल,सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश सिंह,निर्मल कुमार गुप्त सहित लेखक, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी मौजूद रहे।