-अवध विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
अयोध्या। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के श्रीराम शोध पीठ सेमिनार हॉल में कुलपति कर्नल बिजेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार ’रोल ऑफ इंडियन नॉलेज सिस्टम फॉर अचीविंग द गोल ऑफ इंडिया 2047’ का आयोजन पर्यावरण विज्ञान विभाग पर्यावरण विज्ञान विभाग एवं आईसीएसएसआर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नगर निगम अयोध्या के मेयर गिरीशपति त्रिपाठी एवं विशिष्ट अतिथि गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी नई दिल्ली के प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी रहे। मुख्य वक्ता के तौर पर लखनऊ विश्वविद्यालय जियोलॉजी के विभाग अध्यक्ष प्रो. ध्रुव सेन सिंह रहे। उद्घाटन सत्र का शुभारंभ प्रभु श्री रामजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।
मुख्य उद्बोधन में गिरीशपति त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमारी प्राचीन धरोहर है। सिर्फ सूचना का एकत्रीकरण कभी सुखद नहीं होता। ऋषियों की इस धरती पर हमें अनेक उपहार प्राप्त हुए हैं। गीता का अनुभूति परक ज्ञान प्राप्त होने से जीवन में नए मार्ग प्रशस्त होते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रतिनिधि ग्रंथ हमारे वेद है। हमारे ऋषि मनीषियों ने आंतरिक शोध के जरिए प्रकृति के साथ एक सुंदर समन्वय स्थापित किया और उन्हें वेदों में संग्रहित किया। ज्ञान का विस्तार वेद है वेदांग के तहत शिक्षा, कल्प, व्याकरण निरुक्त, छंद और ज्योतिष है।
महापौर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में चिंतन मनन और ध्यान से जो ज्ञान प्राप्त होता है वही अमृत तत्व ज्ञान है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य पूर्ण करने के लिए हमें अपनी मातृभाषा को और सशक्त करना होगा। विकसित भारत 2047 का सपना राष्ट्रीय भाषा के विकास बिना संभव नहीं है। सभी विकसित देश अपनी मातृभाषा में विकास कर रहे हैं। यहां तक कई देशों की मुद्राएं भी उन्हीं के राष्ट्रीय भाषा संकल्प को पूर्ण करती हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा तभी विकसित होगी जब हम उन्हें अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करेंगे।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि यूएनएसडीजी के 17 लक्ष्य को यदि देखा जाए तो सभी का लक्ष्य भारतीय ज्ञान परंपरा के आसपास ही है। भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम मंत्र के रूप में आदिकाल से हमारे सामाजिक परंपराओं में बसा हुआ है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जीवन पद्धति सामाजिक समरसता पर आधारित रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा का लक्ष्य सदैव से तकनीकी कौशल पर आधारित रहा उसे हम सभी ने बुलाया है। वर्तमान विकसित भारत का लक्ष्य तकनीकी कौशल के बिना संभव नहीं है डिजिटल शिक्षा प्रणाली के तहत हम समावेशी ज्ञान परंपरा के साथ आगे बढ़ सकते हैं। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जो सभी को जोड़ रहा है। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सदियों पुरानी है जो कल और विज्ञान से जुड़ी रही है विश्व के सारे देश भारतीय ज्ञान परंपराओं से कहीं ना कहीं से उत्प्रेरित है।
भारत के प्राचीन विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। मुख्य वक्ता प्रो. ध्रुवसेन सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने विश्व को बहुत कुछ दिया है। दुनिया की सर्वाधिक प्राचीन परंपरा हमारी विरासत है। स्वामी विवेकानंद जैसे प्रखर विद्वानों ने वैश्विक पटेल पर इसे स्थापित भी किया है। चिकित्सा विज्ञान, कृषि, अंतरिक्ष, ज्योतिष जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उत्कृष्ट अध्ययन भारत में पहले से विद्यमान है। महर्षि चरक का आयुर्वेदिक चिकित्सा ज्ञान विश्व प्रसिद्ध रहा। महर्षि सुश्रुत जिन्होंने शल्य चिकित्सा का प्रतिमान स्थापित किया। जीवन जीने की सभी पद्धति भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में विकसित हुई है। नगर आयुक्त जयेंद्र कुमार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को हमें कई दृष्टिकोण से अपनाना होगा जिसमें वैश्विक पटल पर भारत की क्या भूमिका हो एवं क्लीन एंड ग्रीन अर्थव्यवस्था में हमारे ज्ञान परंपरा की प्रभावशीलता को दर्शन होगा नवाचार की खोज कर हमें गरीबी मुक्त रोजगार संसाधन युक्त व्यवस्था अपनानी होगी और समाज में लिंगानुपात को भी ठीक करना होगा। जानकारी के अभाव में नगर की वाटर बॉडी को गंदा किया जा रहा है इसके लिए जन जागरूकता की आवश्यकता है।
आइक्यूएसी के निदेशक प्रो. हिमांशु शेखर ने कहा कि भारतीय शिक्षा प्रणाली पूर्ण जीवन पद्धति का निर्माण करती है। देश आर्थिक विकास रूपी रथ पर सवार होकर हमें अपनी संस्कृति को बचाए रखना और ज्ञान परंपरा के अनुरूप स्वयं को विकसित करना है। यदि देखा जाए तो पहले आत्मनिर्भर गांव में वेस्ट जीरो था और पर्यावरण के प्रति लोगों की संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। संगोष्ठी में स्वागत उद्बोधन प्रो. सिद्धार्थ शुक्ल ने किया। कार्यक्रम का संचालन पर्यावरण विज्ञान की शोधार्थी अदिति बरनवाल एवं अपर्णा ने किया।
उद्घाटन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक प्रो. विनोद चौधरी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे ज्यादा आवश्यकता अयोध्या को है। अयोध्या को कैसे विकसित किया जाए इसके लिए हम सभी को यहां की आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य करना होगा। इसी कार्य को पूर्ण करने के लिए विश्वविद्यालय एवं नगर निगम अयोध्या ने एम ओ यू हस्ताक्षरित किया है इसके लिए डॉ. चौधरी ने नगर निगम के प्रति आभार व्यक्त किया है। इस अवसर पर कुलसचिव विनय कुमार सिंह, प्रो नीलम पाठक, प्रो. फर्रुख जमाल, प्रो. संग्राम सिंह, प्रो. गंगाराम मिश्र, वैज्ञानिक पत्रकार डॉ. राज किशोर, आईएफटीएम विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता के अध्यक्ष प्रो. राजेश कुमार शुक्ल, संचार विशेषज्ञ चंद्रकांत शर्मा, डॉ. पी के द्विवेदी, डॉ मनीष सिंह, प्रो. अवधेश कुमार यादव डॉ महिमा चौरसिया, डॉ नवीन पटेल, डॉ. अनिल यादव, डॉ अभिषेक सिंह के साथ वन विभाग अयोध्या, पूर्वांचल विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश नियोजन विभाग,
रामस्वरूप विश्वविद्यालय लखनऊ, उत्तर प्रदेश राजस टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज और, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रयागराज, सागर इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी मध्य प्रदेश, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ, कोल्हन विश्वविद्यालय झारखंड बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आईसीएआर आई न्यू दिल्ली, मदन मोहन मालवीय विश्वविद्यालय गोरखपुर ए आई आर भुवनेश्वर, के वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किया। प्रथम तकनीकी सत्र के संचालन में विवेकानंद इंस्टीट्यूट आफ प्रोफेशनल स्टडीज के प्रो रमेश कुमार शर्मा एवं आईएफटीएम विश्वविद्यालय मुरादाबाद के डॉ. राजेश कुमार शुक्ल की अध्यक्षता में शोधार्थियों के शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. सिद्धार्थ शुक्ल एवं दो महिमा चौरसिया की अध्यक्षता में किया गया। चतुर्थ तकनीकी की सत्र का संचालन डॉ. रुद्र प्रताप सिंह एवं डॉ. संजीव कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में किया गया।