-जागरूकता व उपचार दिलाता है निजात

अयोध्या। बिना सोचे-समझे ऑनलाइन शॉपिंग की लत एक नया मनोरोग बन चुका है जिसे कंपल्सिव बाइंग डिसऑर्डर या आवेशी खरीदारी मनोविकार कहते हैं । यह सामान्य खरीदारी से अलग है, जिसमें लोग जरूरत न होने पर भी लगातार खरीदारी करते हैं तथा खरीदारी करने और ज़रूरत से ज़्यादा पैसे खर्च करने की तीव्र, अनियंत्रित इच्छा होती है, जिससे अक्सर वित्तीय, सामाजिक और भावनात्मक समस्याएं होती हैं, भले ही खरीदारी के बाद अपराधबोध या पछतावा महसूस हो।
यह खरीदारी के आनंद से अलग है क्योंकि इसमें नियंत्रण की कमी, नकारात्मक परिणाम और दैनिक जीवन में हस्तक्षेप होता है और यह अकेलेपन, अवसाद या तनाव से राहत पाने के लिए एक व्यवहार हो सकता है। शॉपिंग करते समय थोड़ी सुखद अहसास तत्पश्चात अपराधबोध, शर्म या उदासी के भाव भी आते हैं। इतना ही नहीं सामाजिक व व्यक्तिगत समस्याएँ भी दिखती हैँ।
इस आदत को परिज़नों तथा दोस्तों से छुपाने व झूठ बोलने की प्रवृत्ति भी दिखायी पड़ती है। इसके मनोवैज्ञानिक कारकों में अवसाद, चिंता, कम आत्मसम्मान, अकेलापन, और नियंत्रण की कमी महसूस करना जैसे मनो विकार भी होतें है। रही सही कसर पूरी कर देती है सोशल मीडिया और विज्ञापन की लोक लुभावनी दुनिया।
सलाहः
संज्ञान व्यवहार उपचार के साथ मूड या चिंता को नियंत्रित करने की दवाए बहुत मददगार होती हैं। अन्य उपाओं में खर्चों पर नज़र रखना, बजट बनाना, और नकदी का उपयोग करना आदि हैँ। जुए की लत जैसे अन्य आवेग नियंत्रण विकारों के समान ही यह एक व्यसन विकार की श्रेणी में आता है। पैका लिमिटेड सभागार मे आयोजित सामयिक मनोविकार जागरूकता कार्यशाला में जिला चिकित्सालय के मनो परामर्शदाता डा आलोक मनदर्शन ने यह बातें कही ।