-वैश्विक-तकरार का है ’होली-हग’ उपचार,नशा व मनोविकार है, मनोअगवापन का आधार
अयोध्या।उमंग व मौजमस्ती से लबरेज होली पर्व के आगाज से जनमानस में खुशमिज़ाजी के हार्मोन एंडोर्फिन व सामाजिक मेल मिलाप व गले मिलने या ’होली-हग’ से मिलने वाले प्रेम मोहब्बत बढ़ाने वाले हार्मोन ऑक्सीटोसिन मे वृद्धि होती है। गले मिलने से उत्पन्न ऑक्सीटोसिन रसायन से ब्रेन मेमोरी-चिप हिप्पोकैंपस में संग्रहीत क्लेश व द्वेष वाली स्मृतियां उदासीन हो कर रिश्तो में विश्वास व मैत्री का संचार करती हैं।
मध्य-एशिया मे जारी संघर्ष समाधान में ’होली-हग’ प्रभाव अति प्रासंगिक है। होली-पर्व में म्यूजिक, डांस, रंगने-रंगाने आदि की मस्ती के अति-हुड़दंग व उन्माद रूप से रंग में भंग वाली समूह-दशा भी संभावित रहती है, क्योंकि मनोउत्तेजक ब्रेन-केमिकल डोपामिन के नशा जनित अतिवृद्धि से मेंटल-हाइजैक होने की संभावना रहती है, जिसके अमर्यादित,अश्लील, आक्रामक, अराजक व अपराधिक दुष्प्रभाव दिख सकते है।
व्यक्तित्व-विकार व नशे की है अहम भूमिकाः होली-उन्माद मनोदशा की चपेट मे आने की सम्भावना उन किशोर व युवाओ मे प्रबल होती है जो पहले से ही बॉर्डर लाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर, पैरानॉयड पर्सनालिटी डिसऑर्डर,ऐंटी सोशल पर्सनालिटी डिसऑर्डर या अवसाद व उन्माद की मनोदशा से ग्रसित होते है। रही सही कसर नशा पूरी कर देता है क्योंकि नशीले पदार्थ मनोउत्तेजना हार्मोन डोपामिन में असामान्य वृद्धि कर देते है।
सलाह :
पर्व-जनित हुड़दंग व उन्माद बचाव में परिजन व अभिभावकों का अहम रोल है । अभिभावक रोल-माडलिंग करते हुए पाल्य के व्यवहार पर पैनी नज़र रखें तथा उनसे मैत्री पूर्ण सामंजस्य इस तरह बनाये कि पर्व जनित स्वस्थ आनन्द का सम्यक व्यक्तित विकास हो सके और विकृत समूह-दबाव या परवर्टेड पीअर-प्रेशर से निकलने का आत्मबल विकसित हो सके । यदि असामान्य व उद्दण्ड व्यवहार व नशाखोरी लगातार दिखे तो मनोपरामर्श अवश्य लें। ज़िला चिकित्सालय के मन-कक्ष मे आयोजित होली-पर्व जनित मनो जागरूकता विषयक कार्यशाला मे यह बातें मनोपरामर्शदाता डॉ आलोक मनदर्शन ने कही।