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लोकतंत्र का रंग : भाजपा ने मनमाफिक पाया परिणाम

बेहद लंबे और कर्कशभरे चुनाव मंथन के बाद जो परिणाम सामने आये हैं, वे इस देश में तमाम विसंगतियों के बावजूद लोक की लोकतंत्र में आस्था को दर्शाते हैं। मोदी व केंद्र सरकार के भविष्य के लिये निर्णायक माने जा रहे उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद है। जनता ने योगी की झोली फिर पांच साल के लिये भर दी है। साथ ही देश के सबसे बड़े राज्य ने 2024 के लिये मोदी की उम्मीदों को नई परवाज दी है। इसी तरह उत्तराखंड में तमाम मिथकों को किनारे कर भाजपा की वापसी हुई है, लेकिन एक बार फिर मौजूदा मुख्यमंत्री चुनाव हारा है। बहरहाल, इस छोटे पर्वतीय राज्य में राजनीतिक अस्थिरता की आशंकाएं खत्म हुई हैं। वहीं कांग्रेसी दिग्गज हरीश रावत के राजनीतिक भविष्य पर विराम चिन्ह लग गया है। ये चुनाव परिणाम कहीं न कहीं मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के जुमले को हकीकत में बदलते नजर आये हैं। कमोबेश, गोवा व मणिपुर में भी भाजपा के मनमाफिक हुआ है।

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उत्तराखंड के हिमालय से मणिपुर के पहाड़ों तक तथा समुद्रतट पर गोवा तक कामयाबी से भाजपा प्रफुल्लित है। मगर पंजाब के नतीजों ने आम आदमी पार्टी को नई ताकत और अरविंद केजरीवाल के राष्ट्रीय कद को नई ऊंचाई दी है। जैसा कि मतदान के बाद के सर्वेक्षणों में कहा जा रहा था कि पंजाब में आप की सरकार बन रही है, वैसा ही हुआ। लेकिन कामयाबी का संख्याबल इतना बड़ा होगा, इसका अनुमान चुनाव पंडितों को भी नहीं रहा होगा। वर्तमान व निवर्तमान मुख्यमंत्रियों को पंजाब के जनमानस ने जिस तरह सिरे से खारिज किया, उससे साफ है कि जनता बदलाव का मन बना चुकी थी। कांग्रेस में सत्ता संघर्ष का जैसा विद्रूप सामने आया उसने जागरूक पंजाबी मतदाताओं को बदलाव के लिये बाध्य किया। सही मायने में पंजाब के जागरूक मतदाता वर्ग ने परंपरागत राजनीतिक दलों को सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने पंजाब के संवेदनशील मतदाता को खासा खिन्न किया। महत्वाकांक्षाओं के आत्मघाती कदम ने कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ा। तमाम विज्ञापनबाजी, आसमान से तारे तोड़ लाने के वायदे तथा मुफ्त के तमाम वायदों से भी नाराज मतदाताओं का मन नहीं बदला।

जाहिर बात है कि देश के आम मिजाज से अलग प्रतिक्रिया देने वाले पंजाब का जनमानस देश के परंपरागत राजनीति दलों से लंबे समय से खिन्न चला आ रहा था। एक-आध बार के अपवाद को छोड़ दें तो वह हर पांच साल में बदलाव के पक्ष में फैसला देता रहा है। वर्ष 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर थी पंजाब के जनमानस ने आप को सार्थक प्रतिसाद देकर अपने प्रतिक्रियावादी रवैये से अवगत करा दिया था। यह स्पष्ट था कि पंजाब का मतदाता कांग्रेस को फिर से सत्ता में लौटाने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं था। अकालियों की कारगुजारियां भी उसे रास नहीं आ रही थीं। साल भर चले किसान आंदोलन का झंडा पंजाब के किसान व सामाजिक संगठनों ने उठाये रखा। केंद्र सरकार के प्रति उनकी नाराजगी तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद कम होने की कोई गुंजाइश नहीं थी। खेती संस्कृति में रचे-बसे पंजाब ने किसान आंदोलन में बड़ी कीमत चुकायी थी। उसके जख्म अभी हरे थे। ऐसे में भाजपा व कैप्टन अमरेंद्र के गठबंधन को वोट देने का तो सवाल ही नहीं था। वैसे भी भाजपा की नैया उसके सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल के साथ ही पार उतरती रही है। ऐसे में आम आदमी पार्टी को आजमाने के लिये एक मौका देना मतदाताओं ने मुनासिब समझा। आम आदमी पार्टी के चुनावी एजेंडे ने भी किसी हद तक जनमानस को उद्वेलित किया।

हकीकत यही है कि नशे के दलदल में धंसते पंजाब व युवा पीढ़ी के भटकाव की वजह नेे पंजाब के जनमानस को राजनीतिक बदलाव के लिये प्रेरित किया। बेरोजगारी बड़ा मुद्दा रहा है, कोरोना काल के संकट ने इसे और विकराल किया। पंजाब के आर्थिक हालात से खिन्न होकर और खेती से होते मोहभंग ने बड़ी संख्या में युवाओं को पलायन के लिये बाध्य किया है। ऐसे में पंजाब के प्रतिक्रियावादी जनमानस ने परंपरागत राजनीतिक दलों से निराश होकर राजनीतिक परिदृश्य में कमोबेश नये राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी पर भरोसा जताया। पंजाब के जनमानस का मिजाज रहा है कि वह अपने मनोभावों के अनुकूल बदलाव चाहता है। इस बार उसने पंजाब की बेहतरी के लिये एक नया कदम बढ़ा दिया। वहीं इस विशाल जनादेश ने आम आदमी पार्टी की जिम्मेदारी भी बढ़ा दी है।
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