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कोरोना का काला साया : ब्लैक फंगस

-होम्योपैथी महासंघ, सेवा भारती व आरोग्य भारती का संयुक्त स्वास्थ्य संवाद

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-पहले कोरोना फिर म्यूकोरमयकोसिस क्या हमारी इम्युनिटी लगातार हो रही कमजोर

अयोध्या । होम्योपैथी महासंघ आरोग्य भारती व सेवा भारती के संयुक्त तत्वाधान में चल रही होलिस्टिक टेलिकन्सल्टेशन सेवा से अब तक 3500 से अधिक लोगों ने अपने स्वास्थ्य सम्बन्धी जिज्ञासाओं के समाधान प्राप्त किये। इसी क्रम मे आमजन के मन मे भ्रम भय व भ्रांतियों के निवारण हेतु ऑनलाइन स्वास्थ्य संवाद में ब्लैक फंगस के खतरे पर चर्चा की गई। चर्चा में सेवा भारती मंत्री डॉ प्रेमचन्द्र ने विषय रखा पिछले वर्ष से जैसे प्रकृति और मनुष्य में शक्ति परीक्षण की प्रतियोगिता सी चल रही है, अदृश्य शक्ति के रूप में एक विषाणु कोरोना ने समूचे विश्व मे महामारी का रूप धर विकसित विज्ञान को चुनौती दे डाली। इं रवि तिवारी ने विषय प्रस्तुत करते हुए कहा उपलब्ध संसाधनों में बचाव के रास्ते खोजते मानव स्वास्थ्य को थोड़ा विश्राम मिला, वैज्ञानिकों ने जान लगाकर जब तक वैक्सीन खोजी और हम निश्चिंत होने लगे तब तक कोरोना ज्यादा शक्तिशाली होकर नए रूपों में एक बार पुनः मनुष्यों के जीवन के लिए संकट बन गया और इस बार इसके आक्रमण का दायरा सामान्य सर्दी जुकाम से बढ़ कर हृदय व अन्य अंगों तक पहुँच गया, इतना ही नही जो लोग बच भी गए उनमें एक नया खतरा ब्लैक फंगस के रूप में नजर आया जिसने पुनः मानव जीवन के लिए संकट पैदा कर दिया है। लगातार एक के बाद एक स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौतियों में चिकित्सकों ने बचाव के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की मजबूती को ही जरूरी बताया।
इसके बाद म्यूकॉरमायकोसिस के बारे में विषय प्रबोधन करते हुए वरिष्ठ होम्योपैथी चिकित्सक डॉ उपेन्द्रमणि त्रिपाठी ने बताया
मिट्टी मे पाये जाने वाले एक प्रकार के कवक (माइसिटीज) की भिन्न प्रजातियों जैसे राईजोपस, मोल्ड, म्यूकोर, एपॉफिसोमि, आदि का मानव शरीर की म्यूकस मेम्ब्रेन (त्वचा या अंगों के भीतरी वाह्य आवरण ;श्लैष्मिक आवरण) में संक्रमण हो सकता है। वर्तमान समय मे म्यूकोरमाईसीटीज प्रजाति के संक्रमण के कारण इस बीमारी को म्यूकोरमयकोसिस कहा जाता है।

संक्रामकता के बारे में जगदीश के प्रश्न पर डॉ उपेन्द्रमणि ने बताया यह कोई नया संक्रमण नहीं , बहुत पहले से है,बहुत कम होने वाला संक्रमण है किंतु वर्तमान समय मे जैसी संख्या के आंकड़े दिख रहे हैं उससे यह निश्चित कहा जा सकता है कि यह मनुष्य की घटती इम्युनिटी का संकेत है। अध्ययनों में पाया गया है कि सामान्यतः लंबे समय से इम्यून सिस्टम को कमजोर करने की दवाएं , स्टेरॉयड, कार्टिकोस्टेरॉयड ले रहे व्यक्तियों, कीटोएसिडोसिस के साथ मधुमेह, एचआईवी , कैंसर, या अंग प्रत्यारोपण या स्टेम सेल थेरेपी करवा चुके लोगों में, अथवा किसी संक्रामक बीमारी जैसे कोविड से ठीक हो चुके या अन्य व्यक्तियों में ब्लैक फंगस का कारण उनकी क्षीण हुई प्रतिरक्षा प्रणाली ही है।
डॉ त्रिपाठी ने बताया वर्तमान समय की परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए अस्पतालों या घरों में गंदे , छोटे , कम हवादार अथवा सीलनयुक्त कमरे, पुराने धूल जमा एसी, कूलर, पंखे,ठीक तरह विसंक्रत न हो सके चिकित्साउपकरण का एकाधिक प्रयोग, पुराने अस्वच्छ मास्क, रूमाल, ऑक्सीजन कन्संट्रेटर में सामान्य जल का प्रयोग से सांस के माध्यम से अथवा मुंह द्वारा संक्रमण की प्रबल संभावनाएं रहती हैं। संक्रमण होने के बाद आंख, नाक, या मुंह की म्यूकस मेम्ब्रेन में सूजन के साथ इसकी अविभाजित शाखाएं निरन्तर बृद्धि करती हुई यदि मस्तिष्क तक पहुँच गयीं तो मृत्यु हो सकती है।

क्या हैं पहचान के लक्षण ?

डॉ उपेन्द्र ने बताया कोविड के बाद भी नाक बंद सी लगे, अथवा संक्रमण होने के बाद चेहरे की त्वचा पर आंख, नाक, या जबड़े के पास कहीं भी छूने पर दर्द की अनुभूति, नाक आंखों में लालिमा, सूजन, हल्का स्राव या खून जैसा स्राव दिखे, अथवा सिर दर्द, सांस लेने में हल्की तकलीफ हो तो भी इसे हल्के में न लें, अविलम्ब योग्य चिकित्सक से जांच कराकर चिकित्सा करनी चाहिए। आंख नाक के पास लालिमा, चेहरे पर एकतरफा सूजन, बुखार, सिरदर्द,खांसी, सांस लेने में दिक्कत, खून की उल्टी, आंखों में अंदर से सूजन आदि प्रमुख लक्षण हैं।

पुष्टि कैसे की जाती है ?

सामान्य लक्षणो के आधार पर खून की जांच, सीटी स्कैन, एम आर आई अथवा इसके बाद बायप्सी से पुष्टि हो सकती है।

बचाव और उपचार के लिए क्या उपाय है ?

समय पर पहचान व पुष्टि हो जाये तो प्रचलित चिकित्सा प्रणाली में उपयुक्त एंटीफंगल व अन्य दवाएं दी जाती हैं। संक्रमित हो उपचार खोजने से बेहतर बचाव कर सुरक्षित व स्वस्थ रहना है। अतः अपने आस पास घर मे गंदगी व सीलन न रहने दें, गंदे कपड़े, रूमाल, तौलिए,ग्लब्स, मास्क का प्रयोग न करें, एसी, कूलर सफाई के बाद ही प्रयोग करें। चिकित्सकीय उपकरणों को ठीक तरह से विसंक्रमित करने के बाद ही प्रयोग करना चाहिए, ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर में स्टराइल पानी का ही प्रयोग करें।

होम्योपैथी में क्या हैं संभावनाएं ?

डॉ उपेन्द्रमणि का कहना है कि संक्रमण के बाद इसकी बढ़ने की गति तीव्र है अतः किसी भी पद्धति से उपचार की उपयोगिता समय पर निर्भर है। लक्षणो की दृष्टि से यह साइको सिफिलिटिक प्रेजेंटेशन है और म्यूकस मेम्ब्रेन पर संक्रमण के असर को ध्यान में रखते हुए होम्योपैथी की थूजा, काली आयोड, कैल्केरिया कार्ब, कैल्केरिया फास, सीपिया, क्लोरम, एसिड नाइट्रिक , सिकल कॉर आदि बहुत सी औषधियां है जिनका प्रयोग योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक के मार्गदर्शन में करने पर आशातीत लाभ मिल सकता है। होम्योपैथी से उपचार में एक विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इस पद्धति में औषधि , उसकी शक्ति और प्रयोग तीनो का चयन
अलग अलग व्यक्ति में अलग हो सकता है इसलिए जागरूकता के लिए जानकारी प्राप्त करना तो उचित है किंतु स्वयं चिकित्सक नहीं बनना चाहिए।

डॉ उपेन्द्रमणि त्रिपाठी
महासचिव- होम्योपैथी चिकित्सा विकास महासंघ
सहसचिव- आरोग्य भारती अवध प्रान्त

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