तम्बाकू : दवा बनकर जहर से बचाती है होम्योपैथी

होम्योपैथिक चिकिअभावत्साविद डॉ उपेन्द्र मणि त्रिपाठी ने कहा वर्तमान में युवाओ के नशे की गिरफ्त में आने के प्रमुख कारण संस्कारयुक्त और चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा का 

पहले शौक और फिर लत लग जाने वाले नशे की गिरफ्त में आये लोगो से यदि पूछा जाय कि वे इसे छोड़ क्यों नही देते तो बड़ा मासूम सा जवाब देते है ” आदत पड़ गयी है अब साथ ही जाएगी” । इस जवाब को क्या समझेंगे मासूमियत ,बेबसी, कमजोरी, या रोग ..जो भी हो मगर चिकित्सको का मानना है कि एडिक्शन भी एक तरह का मनोरोग है जिसकी चिकित्सा की जा सकती है किंतु इसमे रोगी को स्वयं भी भाग लेना होता है। तम्बाकू निषेध दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य एवं होम्योपैथी जागरूकता अभियान के तहत नाका हनुमानगढ़ी के होम्योपैथिक चिकित्साविद डॉ उपेन्द्र मणि त्रिपाठी ने कहा वर्तमान में युवाओ के नशे की गिरफ्त में आने के प्रमुख कारण संस्कारयुक्त और चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा का अभाव, परिवार के किसी सदस्य की देखादेखी, आर्थिक तंगी या अधिक जेब खर्च मिलने एवं आनन्द प्राप्ति की आजादी, कुछ नया करने की अभिलाषा,अभिलाषित क्षेत्र में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाने से तनाव, अकेलापन, घरेलु कलह, फिर बेरोजगारी, गलत संगति, जागरुकता का अभाव आदि हो सकते हैं जो अलग अलग तरीके मनोदशा को प्रभावित कर समस्या के समाधान खोजने की बजाय उससे बचने की प्रवृत्ति के अनुरूप इस गलत चयन का शिकार हो जाते हैं।
डॉ त्रिपाठी ने बताया वस्तुतः मस्तिष्क में डोपामीन और सेरोटोनिन का स्तर जब प्रभावित होता है तो व्यक्ति में आनन्द और स्फूर्ति या आलस्य आता है, निकोटिन या अन्य प्रकार के नशे में व्यक्ति की संतुष्टि का स्तर उसकी मनोदशा के अनुकूल रहने लगती है इसलिए उसे बार बार नशे की जरूरत बनने लगती है।होम्योपैथी में व्यक्ति के मानसिक लक्षणों पर अधिक ध्यान दिया जाता है और इसके मनोविज्ञान के अनुसार नशे के रोगियो का इलाज करते समय  मानसिक,शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक सभी आयामो को समग्र रूप से अध्ययन किया जाता है।इसलिए चिकित्सक अपने रोगी से मित्रवत  काउंसलिंग, वार्तालाप, शिक्षाप्रद सामग्री द्वारा पहले नशे को छोड़ने के लिए  व्यक्ति मनोदशा को मजबूत करने का प्रयास करते है जिससे वह दवाओं का सेवन करने को तैयार हो सकें। उनकी दिनचर्या में सुधार, खेलकूद,या अन्य गतिविधियों में सहभागिता आदि जिनमे परिवार मित्र सभी की कुछ न कुछ भूमिका होती है निर्धारित कर सकते है। यह व्यक्ति में विश्वास जगाने वाली दीर्घकालिक किन्तु प्रभावी तरकीब है।
डॉ उपेन्द्र मणि ने बताया कभी भी अचानक कोई आदत नही छूट सकती, अक्सर देखा गया है यदि नशे के आदी व्यक्ति को खुराक न मिले तो उसमें अजीब सी बेचैनी,धड़कन,या उदासी,बनी रहती है,जम्हाई, आंख नाक से पानी, मांसपेशियों में ऐंठन, सिर पेट मे दर्द, व्यवहार में चिड़चिड़ाहट और उग्रता, प्यास,अनिद्रा, उल्टी, आदि कई सारे लक्षण प्रकट होने लगते हैं किंतु धीरे धीरे यह 8 -10 दिन में सामान्य होने लगते हैं।
डॉ उपेन्द्र मणि त्रिपाठी ने होम्योपैथी से इसका कारण व्यक्ति पर सिफिलिटिक मायाज्म की प्रभाविता से सोरा या सायकोटिक का दूषित होते जाना है इसलिए तेजी से रसायनिक परिवर्तनों में विभ्रम हो सकता है किंतु कुशल होम्योपैथ व्यक्ति की मनोदशा को समझकर यदि तत्सम व्यवहार कर रोगी का उपचार करते हैं तो संभव है कि रोगी जल्दी ही स्वयं का आत्मबल मजबूत पाता है और इसी संकल्पशक्ति के साथ जब वह दवाईयों का सेवन करता है तो लाभ प्राप्त करता है।
डॉ त्रिपाठी का कहना है कि तम्बाकू भी प्रकृति का उत्पाद है इसलिए इसमें भी औषधीय गुण है किंतु लोग इसका और इसके जैसे कई अन्य का सेवन नशे के लिए करते हैं जो धीमे जहर की तरह उनके जीवन के लिए घातक होती है किंतु इन्ही की न्यूनतम मात्रा का उपयोग औषधि की तरह कार्य करता है। तम्बाकू से बनी होम्योपैथी की दवा हृदयरोगों सहित तमाम रोगों की महत्वपूर्ण दवा है।तम्बाकू, सिगरेट की लत छुड़ाने के लिए चिकित्सक के मार्गदर्शन में होम्योपैथी की डैफने इंडिका, कैलेडियं, स्टेफीसैगरिया, टैबेकम, या अन्य कांस्टीट्यूशनल दवाएं उपयोगी हैं।
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