डोपामिन ड्रैग से किशोर हो रहे कंपल्सिव एडिक्सन का शिकार : डा. आलोक

 

 

सोशल मीडिया व पीअर प्रेशर बन रहा है उत्प्रेरक

फैजाबाद। किशोरों में छद्म सुकून व मनोउड़ान की अनुभूति के चंगुल में फंसकर गोपनीय व गैर पारम्परिक नशे की लत बढ़ती जा रही हैं। नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ ड्रग एडिक्शन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार यूरोप व अमेरिका के बाद अब भारत में किशोर नशे की लत के आँकड़े भयानक होते जा रहे हैं। किशोर नशे की लत के साथ ही किशोर अपराध व दुर्घटना के भी आँकड़ों में तेजी से वृद्धि हो रही है। जिला चिकित्सालय के किशोर मित्र क्लीनिक तथा मनदर्शन हेल्पलाइन के आँकड़ों का हवाला देते हुए डा. आलोक मनदर्शन ने किशोर नशे की लत व अपराधिक प्रवृत्ति में प्रबल सह-सम्बन्ध बताया है।  जिसका शिकार मध्य  किशोरावस्था से वे इस प्रकार हो रहे हैं कि परिजनों को इस बात का पता चलने में काफी देर हो जाती है कि किशोर गोपनीय व गैर-पारम्परिक नशे का शिकार हो चुका है। इन गोपनीय नशीले पदार्थों में डिजाइनर ड्रग्स व हुक्का तथा स्टेशनरी, पेंट व काॅस्मेटिक पदार्थों में इस्तेमाल होने वाला टाॅलविन नामक द्रव्य है जिसको सूघने मात्र से ही  उन्हें तीव्र नशे की अनुभूति होती है।

एकाग्रता की कमी, पढ़ाई में मन न लगना व परिणाम में गिरावट, आँखों का धुधलापन व लाल होना, चिड़चिड़ापन, क्रोधित व ठीट स्वभाव, भूख कम या ज्यादा लगना, देर रात तक जागकर नेट चैटिंग, साइबर सेक्स व गेम में मस्त रहना, रैस ड्राइविंग, अति यौन आकर्षण एवं यौन सक्रियता, हिंसा व मारपीट, उद्दण्ड व अमर्यादित व्यवहार, बड़ों की बात न सुनना व जुबान लड़ाना, इत्यादि। नशे की हालत में किये गये किशोर अपराध में वृद्धि गम्भीर समस्या बनती जा रही है।

उन्होंने कहा कि किशोर मस्तिष्क के रिवार्ड सिस्टम में स्थित न्यूक्लियस में डोपामिन नामक मनोरसायन के बढ़ने से छद्म आनन्द व मनो उड़ान की अनुभूति होती है। किसी प्रकार के नशीले पदार्थ के सेवन से ब्रेन न्यूक्लियस में डोपामिन की बाढ़ आ जाती है और मस्ती का एहसास होने लगता है और फिर डोपामिन का स्तर सामान्य होने पर हिप्पोकैम्पस द्वारा डोपामिन की तलब पैदा होती है जिसे डोमामिन ड्रैग कहा जाता है। इस प्रकार नशे की मात्रा बढ़ती जाती है। यह सम्भावना उन किशोरों में बहुत अधिक होती है जो किसी व्यक्तित्व विकार, अवसाद, उन्माद, ए0डी0एच0डी0, ओ0डी0डी0 व ओ0सी0डी0 से ग्रसित होते हैं। इसके अलावा मनोतनाव व नशे की पारिवारिक पृष्ठभूमि या मित्रमण्डली से सरोकार रखने वाले किशोर भी हाईरिस्क ग्रुप में आते हैं।

डा. आलोक का कहना है कि  यदि किशोर के व्यवहार में असामान्यता दिखने लगे तो अभिभावक उनकी गतिविधियों पर मैत्रीपूर्ण व पैनी नजर रखे। उससे मार-पीट नहीं, अपितु प्यार से सम्बन्ध विकसित कर उसके गोपनीय नशे की लत के बारे में जानने का प्रयास करें। स्वीकार्य किये जाने पर डाट-फटकार व तिरस्कार की बजाय किशोर को नशे के दुष्परिणाम के प्रति जागरूक करें। पारिवारिक वातावरण को बेहतर बनाने की कोशिश करें तथा स्वस्थ मनोरंजक गतिविधियों को बढ़ावा दें। यदि इसके बाद भी किशोर गुमशुम व असामान्य दिखे तो निःसंकोच मनोपरामर्श लेने में देरी न करें। काॅगनिटिव थिरैपी किशोर को नशे से उबारने में बहुत ही कारगर है क्योंकि इससे डोपामिन ड्रैग की सक्रिय पहचान तो होती है साथ ही एडिक्टिव कम्पलशन को रोकने में भी मदद मिलती हैं।कार्यशाला के मुख्य अतिथि जिला चिकित्सालय के प्रमुख अधीक्षक डॉ हरिओम श्रीवास्तव रहे। कार्यशाला में मिशन के कार्यकारी सदस्य बाल किशन, अरशद,अनित दास, डॉ सी पी शुक्ला मौजूद रहे।

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